जगदलपुर: देश में आस्था और अनूठी सांस्कृतिक परंपराओं के सबसे बड़े केंद्र छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में इन दिनों ऐतिहासिक 'गोंचा महापर्व' को लेकर तैयारियां चरम पर हैं। इस वर्ष भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की भव्य रथयात्रा 16 जुलाई 2026 को निकाली जाएगी। पूरे देश में जहां पुरी की रथयात्रा की धूम रहती है, वहीं बस्तर अंचल में इसे 'गोंचा महापर्व' के रूप में बेहद पारंपरिक, भव्य और आदिम संस्कृति के अनूठे रंग में मनाया जाता है।
इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता बस्तर के आदिवासियों और स्थानीय लोगों की वह अटूट आस्था है, जो पिछले कई सौ सालों से बिना किसी बदलाव के आज भी जीवंत है। बस्तर का यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह उत्तर और दक्षिण बस्तर की जनजातीय कला और सभ्यता का एक बेजोड़ उदाहरण भी पेश करता है।
600 वर्षों की समृद्ध विरासत: 360 आरण्यक ब्राह्मण समाज और आदिवासियों का अनूठा संगम
जगदलपुर: बस्तर के ऐतिहासिक गोंचा महापर्व का इतिहास बेहद गौरवशाली है, जिसे करीब 600 सालों से निरंतर बिना रुके मनाया जा रहा है:
आरण्यक ब्राह्मण समाज की भूमिका: इस पर्व को बस्तर का पारंपरिक '360 आरण्यक ब्राह्मण समाज' पूरी पवित्रता और वैदिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न कराता है।
क्या है मुख्य आकर्षण: इस पूरे महापर्व का सबसे रोमांचक और मुख्य आकर्षण 'तुपकी' होती है। इस वर्ष के आयोजन को लेकर गोंचा महापर्व समिति ने एक बड़ी जानकारी साझा की है। समिति के अनुसार, इस साल रथयात्रा के दौरान लगभग 100 स्थानीय युवा एक साथ अपनी पारंपरिक 'तुपकी' से भगवान जगन्नाथ को सलामी देंगे।
बांस की पारंपरिक बंदूक 'तुपकी' से प्रभु को दी जाती है सलामी; पूरे भारत में केवल बस्तर में है यह परंपरा
जगदलपुर: बस्तर में रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ को सलामी देने का तरीका बेहद जुदा और अद्भुत है, जो दुनिया में अन्य कहीं देखने को नहीं मिलता:
देशी बंदूक 'तुपकी': बस्तर के वनवासी और आदिवासी समुदाय के लोग बांस के खोखले टुकड़े से एक विशेष प्रकार की पारंपरिक खिलौना बंदूक तैयार करते हैं, जिसे 'तुपकी' कहा जाता है।
चिरौटा के फल का उपयोग: इस बांस की नली के भीतर जंगली पौधे 'चिरौटा' के छोटे-छोटे गोल फलों (जिन्हें 'गोंचा' या तुपकी की गोली कहा जाता है) को ठूसकर भरा जाता है। इसके बाद जब पीछे से दबाव डाला जाता है, तो प्रेशर के कारण पटाखे की तरह 'ठांय-ठांय' की तेज आवाज निकलती है।
गार्ड ऑफ ऑनर: रथयात्रा के दौरान जब भगवान जगन्नाथ का रथ मुख्य मार्गों से गुजरता है, तो श्रद्धालु इसी तुपकी को चलाकर भगवान को 21 तोपों की सलामी की तर्ज पर 'गार्ड ऑफ ऑनर' देते हैं। पूरा शहर इस अनोखी आवाज से गुंजायमान हो उठता है।
रंग-बिरंगे कागजों से सजती हैं तुपकियां; अंदरूनी गांवों के आदिवासियों को मिलता है बंपर मौसमी रोजगार
जगदलपुर: यह महापर्व न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है, बल्कि यह बस्तर के घने और अंदरूनी जंगलों में रहने वाले गरीब आदिवासियों की आजीविका का एक बहुत बड़ा सहारा भी है:
बाजारों में सजी दुकानें: पर्व के नजदीक आते ही बस्तर के ग्रामीण इलाकों से आदिवासी कारीगर बड़ी संख्या में तुपकियां बनाकर शहर लाते हैं। वे इन बांस की बंदूकों को और अधिक आकर्षक बनाने के लिए उन पर रंग-बिरंगे चमकीले कागज, पन्नियां और कलाकृतियां चिपकाते हैं।
आर्थिक स्वावलंबन: रथयात्रा के दिन जगदलपुर शहर और आसपास के मेलों में इन तुपकियों की जमकर बिक्री होती है। दूर-दराज के गांवों से आने वाले इन ग्रामीणों के लिए यह दो-तीन दिनों का एक ऐसा सीजनल व्यापार होता है, जिससे उन्हें अच्छी-खासी आमदनी हो जाती है। बच्चे और बड़े सभी बड़ी उत्सुकता के साथ इन तुपकियों को खरीदते हैं और भगवान जगन्नाथ के रथ के आगे इसे चलाकर अपनी आस्था प्रकट करते हैं।


