भारतीय नागरिक उड्डयन (एविएशन) क्षेत्र इस समय एक अभूतपूर्व और गंभीर विरोधाभास के दौर से गुजर रहा है। एक तरफ देश में नए हवाई अड्डों के लगातार तेजी से विस्तार का दावा किया जा रहा है, तो दूसरी तरफ प्रमुख एयरलाइंस गहरे वित्तीय संकट, विमानों की ग्राउंडिंग और भारी ढांचागत कमियों के बोझ तले बुरी तरह दबी हुई हैं। प्रमुख रेटिंग एजेंसी इक्रा (ICRA) के अनुमानों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 के दौरान भारतीय एविएशन इंडस्ट्री को 17,000 से 18,000 करोड़ रुपये का भारी-भरकम शुद्ध घाटा होने की आशंका जताई गई है। दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा एविएशन मार्केट बनने का दावा करने वाले भारत के आसमान पर आखिरकार यह गहरा संकट क्यों मंडरा रहा है और एयरलाइंस का पूरा गणित कहां बिगड़ रहा है, आइए इसे विस्तार से समझते हैं।
सरकारी आंकड़ों में छुपी गिरावट की हकीकत क्या बयां कर रही है?
वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही (Q2FY27) के ताजा आंकड़े एविएशन इंडस्ट्री के लिए साफ तौर पर खतरे की घंटी साबित हो रहे हैं। इस तिमाही के दौरान घरेलू हवाई यात्रियों की कुल संख्या घटकर 3.67 करोड़ रह गई है। यदि इसकी तुलना पिछली तिमाही (Q1FY27) के 4.35 करोड़ यात्रियों के साथ की जाए, तो यह सीधे तौर पर 16% की भारी-भरकम तिमाही गिरावट है। वहीं, पिछले वर्ष की इसी समान अवधि (Q2FY26) के 3.89 करोड़ यात्रियों के मुकाबले भी इसमें 6% की सालाना गिरावट दर्ज की गई है।
किन मुख्य कारणों से गहरे वित्तीय घाटे के दलदल में डूब रही हैं एयरलाइंस?
सरकारी रिपोर्टों के अनुसार, देश में चालू हवाई अड्डों की संख्या वर्ष 2014 के 74 से बढ़कर वर्ष 2025 तक लगभग 163 तक पहुँच चुकी है और वित्त वर्ष 2023-24 में कुल यात्री यातायात 37.6 करोड़ (376 मिलियन) के आंकड़े को पार कर चुका था। लेकिन इसके बावजूद मौजूदा जमीनी हकीकत बेहद चिंताजनक बनी हुई है। एक तो देश में पेशेवर विमानन कंपनियों की वैसे ही भारी कमी है और केवल दो-तीन बड़े खिलाड़ी ही बाजार में बचे हैं, जो खुद इस समय गंभीर संघर्ष से जूझ रहे हैं। हाल ही में सरकार की तरफ से कुछ नई विमानन कंपनियों को लाइसेंस जारी होने की खबरें जरूर सामने आई थीं, लेकिन ये कंपनियां अब भी बड़े पैमाने पर अपना व्यावसायिक परिचालन शुरू करने की स्थिति में बिल्कुल नहीं दिख रही हैं।
क्षमता में भारी गिरावट: एविएशन डेटा एनालिटिक्स फर्म ओएजी (OAG) के सितंबर 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, भारत की कुल सीट क्षमता में साल-दर-साल आधार पर 4.5% की कमी आई है और यह घटकर मात्र 2.27 करोड़ सीटें रह गई है। इसमें घरेलू क्षमता में 5.6% और अंतरराष्ट्रीय क्षमता में 2.1% की गिरावट दर्ज की गई है।
क्षेत्रीय उड़ानों का बंद होना: उड़ान योजना के अंतर्गत वाणिज्यिक व्यवहार्यता और सरकारी सब्सिडी समाप्त हो जाने के कारण 100 से अधिक महत्वपूर्ण उड़ान मार्ग हमेशा के लिए बंद किए जा चुके हैं।
फ्लीट ग्राउंडिंग की समस्या ने देश की दिग्गज एयरलाइनों को कैसे झकझोरा?
भारतीय उड्डयन क्षेत्र की इस सुस्ती और बदहाली के पीछे वैश्विक आपूर्ति शृंखला (सप्लाई चेन) की विफलताएं और प्रैट एंड व्हिटनी (P&W) इंजन संकट सबसे मुख्य कारण बनकर उभरे हैं:
इंडिगो की स्थिति: जब बाजार का सबसे बड़ा लीडर ही संघर्ष करता है, तो पूरी इंडस्ट्री की सेहत का आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है। जेफरीज और गोल्डमैन सैक्स जैसी वैश्विक ब्रोकरेज फर्मों का अनुमान है कि विदेशी मुद्रा (फॉरेक्स) के नुकसान को जोड़ने से पहले भी, दूसरी तिमाही में इंडिगो को लगभग 695 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा हो सकता है। इसके ऊपर लगभग 1,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त फॉरेक्स नुकसान (रुपये की कमजोरी और कच्चे तेल के ऊंचे खर्च के कारण) अलग से होने की आशंका है। यात्रियों की कमी के चलते विमानों में सीटें खाली उड़ रही हैं, जबकि एयरलाइंस की फिक्स्ड कॉस्ट (जैसे लीज का किराया और कर्मचारियों का भारी वेतन) में कोई भी कमी नहीं आई है। बाजार में लगभग 50% हिस्सेदारी रखने वाली इंडिगो के P&W इंजनों में तकनीकी गड़बड़ी के कारण गंभीर दरारें आने की समस्या उत्पन्न हुई, जिसके परिणामस्वरूप जनवरी 2025 तक इसके बेड़े के 60 से 70 विमान पूरी तरह से ग्राउंडेड हो गए थे।
एअर इंडिया और स्पाइसजेट का संकट: यह संकट केवल इंडिगो तक ही सीमित नहीं है। टाटा समूह के स्वामित्व में आने के बावजूद एअर इंडिया अभी भी अपने विमान बेड़े (फ्लीट) के आधुनिकीकरण और पुरानी परिचालन समस्याओं से उबरने के लिए संघर्ष कर रही है। वहीं, स्पाइसजेट की स्थिति तो किसी से छिपी नहीं है; गंभीर वित्तीय संकट, अनसुलझे कानूनी विवादों और फंड की भारी कमी के कारण इसके भी कई विमान जमीन पर खड़े (ग्राउंडेड) हैं। एअर इंडिया को अपने आक्रामक विस्तार के बीच कुशल क्रू (चालक दल) की कमी और मुंबई एयरपोर्ट के टर्मिनल टी1 के पुनर्विकास कार्यों के कारण अपनी उड़ानों में कटौती करनी पड़ रही है। इसके विपरीत, स्पाइसजेट की बाजार हिस्सेदारी अगस्त 2026 तक लुढ़क कर मात्र 1.2% पर सिमट चुकी है और इसकी परिचालन क्षमता में 45.2% की भारी गिरावट आई है, जिसके चलते यह एयरलाइन नागर विमानन महानिदेशालय (DGCA) की कड़ी निगरानी के दायरे में है।
गो फर्स्ट का दिवालिया होना: गो फर्स्ट जैसी प्रमुख एयरलाइन P&W इंजनों की विफलता और समय पर बैकअप क्लेम न मिलने के कारण अंततः दिवालिया होकर पूरी तरह बंद हो चुकी है।
महंगे एटीएफ और भारी-भरकम वैट ने किस प्रकार बिगाड़ा एयरलाइंस का पूरा गणित?
किसी भी एयरलाइन के कुल परिचालन खर्च का लगभग 30% से 40% हिस्सा अकेले एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF – विमान ईंधन) और विमानों के लीज भुगतान में ही खर्च हो जाता है:
जीएसटी के दायरे से बाहर एटीएफ: विमान ईंधन (ATF) पर वस्तु एवं सेवा कर (GST) लागू न होने के कारण एयरलाइनों को केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी के साथ-साथ विभिन्न राज्य सरकारों का अलग-अलग भारी वैट (VAT) भी चुकाना पड़ता है। उदाहरण के लिए, तेलंगाना में वैट की दर 35.20%, आंध्र प्रदेश में 31% और मध्य प्रदेश में 29% तक है, हालांकि दिल्ली और महाराष्ट्र ने इसे घटाकर 7% तक जरूर किया है।
करों का अत्यधिक बोझ: वर्ष 2014 से 2026 के इस अंतराल के दौरान भारतीय एयरलाइनों ने ईंधन करों के रूप में कुल मिलाकर लगभग 1.62 लाख करोड़ रुपये चुकाए हैं, जिस पर उन्हें इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) का कोई भी लाभ नहीं मिलता है।
भू-राजनीतिक तनाव का असर: पश्चिम एशिया में लगातार जारी युद्ध और तनाव के कारण विमानों को लंबे हवाई मार्गों से उड़ान भरनी पड़ रही है, जिससे ईंधन की खपत काफी बढ़ गई है। इसके अलावा, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये के कमजोर होने से विदेशी मुद्रा देनदारियां एयरलाइंस के लिए बहुत भारी पड़ रही हैं।
नीतिगत कमियों और बुनियादी ढांचे के अभाव ने संकट को कितना और अधिक बढ़ाया?
भारतीय उड्डयन उद्योग की इस बदहाली के पीछे कुछ गंभीर विनियामक और ढांचागत कमियां भी सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं:
विदेशी देशों पर अत्यधिक निर्भरता: भारत में विश्व स्तरीय एमआरओ (MRO – रखरखाव, मरम्मत और ओवरहाल) सुविधाओं का भारी अभाव है, जिसकी वजह से लगभग 85% मेंटेनेंस कार्य सिंगापुर और पोलैंड जैसे विदेशी देशों में आउटसोर्स करने पड़ते हैं। खराब इंजनों की मरम्मत करवाकर उन्हें वापस देश लौटने में कई बार चार महीने तक का लंबा समय लग जाता है।
कुशल पायलटों की भारी कमी: वर्ष 2024 से 2026 के बीच इस उद्योग को कुल 7,000 नए पायलटों की आवश्यकता थी, जबकि डीजीसीए द्वारा वर्ष 2020 से 2024 के दौरान केवल 5,700 कमर्शियल पायलट लाइसेंस (CPL) ही जारी किए गए।
सुरक्षा बनाम व्यावसायिक मुनाफे की जंग: डीजीसीए का नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अधीन होना अक्सर 'रेगुलेटरी कैप्चर' जैसी स्थिति को जन्म देता है, जहां पायलटों के विश्राम और ड्यूटी के घंटों (FDTL) जैसे महत्वपूर्ण सुरक्षा नियमों को सख्ती से लागू करने के बजाय उनमें लचीलापन दिखाया जाता है।
पश्चिम एशिया के संकट ने किस तरह आग में घी डालने का काम किया?
इस देशव्यापी आंतरिक संकट के बीच पश्चिम एशिया में चल रहा भू-राजनीतिक तनाव आग में घी डालने का काम कर रहा है। इस्राइल और ईरान के बीच लगातार बढ़ते टकराव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भयंकर उछाल देखा जा रहा है। जैसा कि स्पष्ट है कि किसी भी एयरलाइन के कुल खर्च का लगभग 40% से 50% हिस्सा केवल एटीएफ पर ही खर्च होता है, और भारत में एटीएफ पर टैक्स का बोझ पहले से ही दुनिया भर में सबसे ज्यादा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल महंगा होने का सीधा और नकारात्मक असर एयरलाइंस के ऑपरेटिंग मार्जिन पर पड़ेगा, जिससे उनके लिए मुनाफा कमाना लगभग असंभव सा हो जाएगा।
क्या नए कानूनी सुधारों से बदल सकेगी भारतीय उड्डयन क्षेत्र की तस्वीर?
सरकार ने उड्डयन क्षेत्र में सुधार के लिए 90 साल पुराने औपनिवेशिक काल के 'एयरक्राफ्ट एक्ट, 1934' को पूरी तरह निरस्त कर नया और आधुनिक 'भारतीय वायुयान अधिनियम, 2024' लागू किया है। इस नए अधिनियम के अंतर्गत सुरक्षा नियमों के उल्लंघन पर एक करोड़ रुपये तक का भारी जुर्माना लगाने, सिंगल-विंडो क्लीयरेंस और एक पारदर्शी अपीलीय व्यवस्था स्थापित करने का प्रावधान किया गया है।
कुल मिलाकर, यदि भारतीय उड्डयन क्षेत्र में समय रहते करों (टैक्स) को तार्किक नहीं बनाया गया, एटीएफ को तत्काल जीएसटी के दायरे में शामिल नहीं किया गया, स्वदेशी एमआरओ (रखरखाव) ढांचे को मजबूती नहीं दी गई और डीजीसीए को पूरी तरह से स्वायत्त निकाय बनाने पर ध्यान नहीं दिया गया, तो देश की एयरलाइंस वित्तीय तबाही के इस खतरनाक चक्रव्यूह से कभी बाहर नहीं निकल पाएंगी। भारत के एविएशन सेक्टर में विकास और अवसरों की कोई कमी नहीं है, लेकिन मौजूदा हालात साफ गवाही दे रहे हैं कि केवल नए एयरपोर्ट बनाने या कागजों पर विमानों के बड़े-बड़े ऑर्डर देने भर से सफलता हासिल नहीं होगी। जब तक सरकार अपनी कर नीतियों को यथार्थवादी नहीं बनाती और एयरलाइंस अपने परिचालन खर्चों पर कड़ा नियंत्रण नहीं रखतीं, तब तक भारतीय आसमान में उड़ान भरने वाली कंपनियों के लिए 'मुनाफा' (प्रॉफिटेबिलिटी) एक दूर का सपना ही बना रहेगा।


