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    कहां से और कैसे शुरू हुई छठ पूजा की परंपरा, भारत के बाहर यहां भी मनाते हैं खूब

    छठ पूजा भारत का एक प्राचीन और सबसे पवित्र त्योहार माना जाता है, जो सूर्य देव (Lord Surya) और छठी मइया को समर्पित होता है. यह त्योहार प्रकृति, जल और सूर्य की आराधना का प्रतीक है. छठ पूजा का संबंध खासतौर पर बिहार राज्य से माना जाता है, जहां से इसकी शुरुआत हजारों साल पहले हुई थी. यह त्योहार आज न सिर्फ बिहार, बल्कि झारखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल के कई हिस्सों में बड़ी श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। यह पर्व मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन और आभार की भावना को दर्शाता है.

    छठ पूजा का इतिहास वैदिक काल से जुड़ा हुआ है. प्राचीन ग्रंथों में सूर्य उपासना का वर्णन मिलता है, जहां ऋषि-मुनि मानसिक और शारीरिक शुद्धि के लिए सूर्य देव की आराधना करते थे. माना जाता है कि कर्ण, जो सूर्य देव और कुंती के पुत्र थे, सबसे पहले छठ पूजा करने वाले व्यक्ति थे. वे रोज नदी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। इसके अलावा महाभारत में भी उल्लेख मिलता है कि द्रौपदी और पांडवों ने अपने संकट के समय सूर्य पूजा की थी. इन कथाओं से यह साबित होता है कि छठ पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि आत्मशुद्धि और ऊर्जाशक्ति का प्रतीक है.

    बिहार से कैसे शुरू हुई छठ पूजा
    छठ पूजा की सबसे गहरी जड़ें बिहार राज्य में पाई जाती हैं. बिहार को इस त्योहार की जन्मभूमि माना जाता है क्योंकि यहां की नदियां जैसे गंगा, कोसी और सोन जल और सूर्य उपासना के लिए उपयुक्त स्थान प्रदान करती हैं. बिहार की धरती हमेशा से भक्ति, कृषि और अध्यात्म का केंद्र रही है. यहां के लोग प्रकृति को जीवनदाता मानते हैं, इसलिए सूर्य और जल के प्रति आभार प्रकट करने की परंपरा यहीं से शुरू हुई. “छठ” शब्द का अर्थ होता है “छठा दिन”, क्योंकि यह त्योहार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है. धीरे-धीरे यह परंपरा बिहार से निकलकर पूरे भारत और विदेशों तक फैल गई.

    छठ पूजा के अनुष्ठान
    छठ पूजा चार दिनों तक चलने वाला त्योहार है, जिसमें भक्त पूरी श्रद्धा, संयम और शुद्धता के साथ उपवास रखते हैं. इन चार दिनों के नाम हैं- नहाय-खाय, लोहंडा और खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य. इस दौरान भक्तगण नदी या तालाब के किनारे खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं और अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। पूजा के दौरान महिलाएं “व्रती” कहलाती हैं, जो बिना अन्न और जल ग्रहण किए उपवास रखती हैं. इस पर्व में उपयोग की जाने वाली हर वस्तु जैसे गन्ना, केला, नारियल, ठेकुआ और दीपक का अपना एक विशेष धार्मिक महत्व होता है.

     

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