More
    Homeराज्यमध्यप्रदेशकौन हैं घनश्याम सिंह? कांग्रेस ने दतिया उपचुनाव में क्यों खेला 'रॉयल...

    कौन हैं घनश्याम सिंह? कांग्रेस ने दतिया उपचुनाव में क्यों खेला ‘रॉयल कार्ड’

    दतिया। मध्य प्रदेश की हाई-प्रोफाइल दतिया विधानसभा सीट पर होने वाले आगामी उपचुनाव को लेकर सियासी पारा चढ़ गया है। सभी प्रमुख राजनैतिक दलों ने इस दंगल के लिए अपने-अपने योद्धाओं के नामों का ऐलान कर दिया है। इस बार का मुकाबला बेहद दिलचस्प होने वाला है, क्योंकि भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने एक बड़ा दांव खेलते हुए पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा की जगह आशुतोष मिश्रा को चुनाव मैदान में उतारा है। वहीं दूसरी तरफ, कांग्रेस पार्टी ने अपने पुराने और कद्दावर चेहरे घनश्याम सिंह पर एक बार फिर भरोसा जताते हुए उन्हें अपना उम्मीदवार घोषित किया है। तीन बार विधायक रह चुके घनश्याम सिंह के मैदान में उतरने से दतिया का यह उपचुनाव त्रिकोणीय और बेहद रोचक हो गया है, जहां भाजपा और कांग्रेस के साथ-साथ आजाद समाज पार्टी (आसपा) भी अपनी पूरी ताकत झोंक रही है।

    राजघराने से है गहरा नाता

    कांग्रेस प्रत्याशी घनश्याम सिंह का दतिया के इतिहास और वहां के राजपरिवार से बेहद करीबी और पुराना संबंध है। वे दतिया राजपरिवार के संरक्षक की भूमिका निभाते हैं। राजनीति उन्हें विरासत में मिली है; उनके पिता महाराज कृष्णसिंह जूदेव भी राजनीति के मझे हुए खिलाड़ी थे और उन्होंने साल 1984 में कांग्रेस के टिकट पर भिंड-दतिया लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हुए संसद तक का सफर तय किया था। पिता की इसी राजनैतिक विरासत को घनश्याम सिंह दतिया में आगे बढ़ा रहे हैं।

    दतिया से दो बार दर्ज कर चुके हैं जीत

    घनश्याम सिंह के चुनावी सफर की शुरुआत बेहद शानदार रही थी। राजपरिवार की पृष्ठभूमि वाले घनश्याम सिंह ने पहली बार साल 1993 में कांग्रेस के बैनर तले दतिया विधानसभा सीट से चुनाव जीता और विधानसभा पहुंचे। हालांकि, इसके बाद हुए अगले चुनाव में पार्टी ने उन्हें मौका नहीं दिया। साल 2003 में कांग्रेस ने उन पर दोबारा भरोसा जताया, जिस पर वे खरे उतरे। इस चुनाव में उन्होंने राजेंद्र भारती को शिकस्त देकर दूसरी बार दतिया के विधायक के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

    सेवढ़ा में भी लहराया है परचम

    दतिया सीट पर साल 2008 के विधानसभा चुनाव में घनश्याम सिंह को भाजपा के दिग्गज नेता नरोत्तम मिश्रा के सामने हार का स्वाद चखना पड़ा था। इसके बाद उन्होंने अपना सियासी रुख बदला और सेवढ़ा विधानसभा क्षेत्र चले गए। साल 2013 के चुनाव में सेवढ़ा से उन्हें भाजपा के प्रदीप अग्रवाल के हाथों पराजय झेलनी पड़ी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। साल 2018 के अगले ही चुनाव में उन्होंने जोरदार वापसी की और भाजपा उम्मीदवार राधेलाल बघेल को मात देकर तीसरी बार विधानसभा पहुंचे। हालांकि, पिछले साल 2023 के मुख्य विधानसभा चुनाव में उन्हें एक बार फिर शिकस्त का सामना करना पड़ा था, लेकिन पार्टी ने उनके अनुभव को देखते हुए इस उपचुनाव में उन्हें दतिया से दोबारा मौका दिया है।

    latest articles

    explore more

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here