More
    Homeराजनीतिप्रशांत किशोर की एंट्री के बाद क्या बदल जाएगी बिहार की राजनीति?...

    प्रशांत किशोर की एंट्री के बाद क्या बदल जाएगी बिहार की राजनीति? तेजस्वी यादव पर सबकी नजर

    पटना| राष्ट्रीय जनता दल (RJD) की कमान अपने पिता और पार्टी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव से संभाल चुके तेजस्वी यादव इन दिनों चौतरफा घिरते नजर आ रहे हैं। कभी लालू प्रसाद को केंद्र की राजनीति में 'किंग मेकर' की भूमिका में देखा जाता था, लेकिन आज स्थिति यह है कि बिहार की राजधानी पटना की बांकीपुर सीट पर आरजेडी अपने प्रत्याशी की जमानत तक नहीं बचा पा रही है। पार्टी के भीतर अंतर्कलह और बाहरी चुनौतियों के बीच अब विधानसभा के गलियारों में नए राजनीतिक चेहरे के रूप में प्रशांत किशोर की एंट्री ने तेजस्वी की राजनीतिक जमीन को और अधिक चुनौतीपूर्ण बना दिया है।

    परिवार के भीतर बढ़ती दूरियां और अपनों की नाराजगी

    तेजस्वी यादव के लिए राजनीतिक मोर्चे के साथ-साथ पारिवारिक मोर्चे पर भी हालात सहज नहीं हैं। पिछले दिनों जब ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) के एक आंदोलन के दौरान तेज प्रताप यादव की गिरफ्तारी हुई थी, तब तेजस्वी ने बड़े भाई के प्रति नरमी और भ्रातृ-प्रेम दिखाने का प्रयास जरूर किया था, लेकिन इससे बड़े भाई की नाराजगी कम नहीं हुई। हालांकि तेज प्रताप को पार्टी या परिवार से बाहर सीधे तौर पर तेजस्वी ने नहीं किया, लेकिन सियासी गलियारों में इन कार्रवाइयों के पीछे उनका ही नाम लिया जाता रहा।

    इसी प्रकार, बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टी को मिली करारी शिकस्त के बाद जब लालू प्रसाद यादव को अपनी किडनी दान करने वाली बेटी रोहिणी आचार्य रोते हुए घर से बाहर निकली थीं, तो उस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में भी तेजस्वी की कार्यशैली को ही जिम्मेदार माना गया था। इसके कुछ समय बाद तेज प्रताप यादव की मुलाकात प्रशांत किशोर से हुई, और बांकीपुर उपचुनाव में जब आरजेडी उम्मीदवार का नामांकन तकनीकी कारणों से रद्द हुआ, तो तेज प्रताप खुलकर प्रशांत किशोर के समर्थन में आ गए। इसके बाद जब प्रशांत किशोर ने उपचुनाव में जीत दर्ज की, तो तेज प्रताप के साथ-साथ रोहिणी आचार्य ने भी खुलकर उन्हें जीत की बधाई दी। इससे साफ जाहिर होता है कि पार्टी के साथ-साथ परिवार के भीतर भी दूरियां कम होने के बजाय लगातार बढ़ती जा रही हैं।

    75 सीटों से लुढ़ककर 25 पर पहुंचे तेजस्वी, विधायकों का घटता दायरा

    तेजस्वी की कार्यशैली और 'घिरे' होने की बात खुद उनकी बहन रोहिणी आचार्य और बड़े भाई तेज प्रताप समय-समय पर उठाते रहे हैं। साल 2020 के विधानसभा चुनाव में विपरीत परिस्थितियों के बावजूद आरजेडी ने 75 सीटों पर जीत दर्ज की थी। हालांकि बाद के दिनों में सियासी जोड़-घटाव का दौर चला। कुढ़नी उपचुनाव में हार मिली, तो बोचहां उपचुनाव में पार्टी ने जीत हासिल की। इसके अलावा असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के चार विधायकों को अपने पाले में लाकर आरजेडी ने अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश की थी।

    लेकिन साल 2024 के उपचुनावों और उसके बाद के घटनाक्रमों में पार्टी का ग्राफ लगातार गिरता चला गया। वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले फ्लोर टेस्ट और अन्य राजनीतिक उठापटक के दौरान पार्टी के कई विधायक सत्ता पक्ष के साथ चले गए। अंततः 2025 के विधानसभा चुनाव में आरजेडी के विधायकों की संख्या सिमटकर मात्र 25 पर आ गई। इन सबके बावजूद तेजस्वी यादव का जमीनी स्तर पर जनता के बीच न दिखना और अपने ही पार्टी विधायकों व नेताओं से दूरी बनाए रखना सबसे बड़ा सवालिया निशान बन गया है।

    विपक्ष की मुख्य भूमिका और विधानसभा से दूरी पर उठते सवाल

    बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद अपने नाम बनाए रखने के लिए न्यूनतम 24 विधायकों का होना अनिवार्य है, और फिलहाल आरजेडी के पास 25 विधायक हैं। लेकिन सदन के भीतर और बाहर जिस तरह से तेजस्वी यादव की अनुपस्थिति देखने को मिलती है, उससे सत्ता पक्ष का काम आसान हो जाता है। हाल ही में संपन्न हुए मानसून सत्र के दौरान भी विपक्षी खेमे के तमाम विधायक तेजस्वी की तलाश करते नजर आए, लेकिन उनका सदन से गायब रहना चर्चा का विषय बन गया।

    दूसरी ओर, बांकीपुर उपचुनाव में पार्टी उम्मीदवार की जमानत जब्त होने और उस पर तेजस्वी द्वारा चुप्पी साधे जाने के बाद राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि तेजस्वी अपनी कार्यशैली में सुधार नहीं लाते हैं, तो सदन के भीतर और बाहर विपक्ष का मुख्य चेहरा कोई और यानी प्रशांत किशोर बन सकते हैं। ज़मीन पर जिस प्रकार प्रशांत किशोर लगातार संघर्ष करते और जनता के मुद्दों को मुखरता से उठाते दिख रहे हैं, वह तेजस्वी यादव के राजनीतिक भविष्य के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप में उभर रहा है।

    latest articles

    explore more

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here