सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उसने किन विकल्पों पर विचार किया और चार साल की सेवा को ही सबसे उपयुक्त मॉडल क्यों माना

– के. पी. मलिक, वरिष्ठ पत्रकार
भारतीय सेना में भर्ती कोई सामान्य रोजगार योजना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, सैनिकों के मनोबल और देश की युद्धक क्षमता से जुड़ा विषय है। इसलिए जब सरकार सेना की दशकों पुरानी भर्ती व्यवस्था बदलकर चार साल की सेवा और उसके बाद अधिकांश जवानों को बाहर करने का मॉडल लागू करती है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इसकी जरूरत क्या थी और इससे सेना को कितना लाभ हुआ? अग्निपथ योजना की असली परीक्षा अब शुरू हो रही है, क्योंकि शुरुआती बैच के अग्निवीर अपनी चार साल की सेवा पूरी करके बाहर होने की स्थिति में पहुंच रहे हैं।
टूर ऑफ ड्यूटी के विचार से शुरू होकर जून 2022 में अग्निपथ योजना के रूप में लागू हुई इस व्यवस्था के तहत अग्निवीरों की सेवा अवधि चार साल रखी गई। प्रत्येक बैच के अधिकतम 25 फीसदी जवानों को नियमित कैडर में शामिल करने का प्रावधान किया गया, जबकि बाकी को सेवा निधि के साथ बाहर जाना है। सरकार ने इसे सेना का औसत आयु-प्रोफाइल कम करने, सैन्य बलों को अधिक युवा बनाने और रक्षा खर्च को तर्कसंगत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन उद्देश्यों को हासिल करने के लिए सेना के मानव संसाधन की पूरी संरचना बदल देना आवश्यक था?
सबसे बड़ी चिंता इस योजना की निर्णय प्रक्रिया को लेकर है। क्या इसे लागू करने से पहले कोई व्यापक स्वतंत्र सैन्य अध्ययन सार्वजनिक किया गया? क्या पूर्व सैन्य अधिकारियों, मानव संसाधन विशेषज्ञों और रक्षा अर्थशास्त्रियों के सुझावों पर खुली चर्चा हुई? क्या सीमित स्तर पर प्रयोग करके उसके परिणामों का आकलन किया गया? सेना जैसी संवेदनशील संस्था में इतने बड़े बदलाव के लिए सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उसने किन विकल्पों पर विचार किया और चार साल की सेवा को ही सबसे उपयुक्त मॉडल क्यों माना।
सरकार और योजना के समर्थकों का तर्क है कि युवा सैनिक अधिक चुस्त होते हैं और आधुनिक युद्ध में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है। यह बात सही है, लेकिन सेना की ताकत केवल जवानों की औसत उम्र से तय नहीं होती। युद्ध के मैदान में अनुभव, अनुशासन, तकनीकी दक्षता और कठिन परिस्थितियों में तत्काल निर्णय लेने की क्षमता भी उतनी ही जरूरी है। एक सैनिक को हथियार चलाने का प्रशिक्षण देने और उसे वास्तविक परिचालन परिस्थितियों में अनुभवी बनाने के बीच बड़ा अंतर है। यदि सेना किसी जवान को प्रशिक्षित करने में समय और संसाधन लगाती है, तो चार साल बाद उसे बाहर करने से पहले यह आकलन जरूरी है कि उससे प्राप्त अनुभव का कितना उपयोग हो पाया।
भारत की सुरक्षा चुनौतियां भी किसी एक सीमा तक सीमित नहीं हैं। चीन के साथ सीमा विवाद, पाकिस्तान के साथ तनाव और पूर्वोत्तर में सुरक्षा संबंधी चुनौतियां लगातार सैन्य तैयारी की मांग करती हैं। ऐसे में प्रशिक्षित सैनिकों की उपलब्धता और अनुभवी कर्मियों का संतुलन महत्वपूर्ण है। यह कहना उचित नहीं होगा कि अग्निपथ योजना ने निश्चित रूप से सेना की क्षमता कमजोर कर दी है, क्योंकि इसके लिए ठोस परिचालन आंकड़ों की जरूरत होगी। लेकिन सरकार से यह पूछना पूरी तरह जायज है कि क्या उसने योजना लागू करने से पहले और बाद में इन पहलुओं का निष्पक्ष मूल्यांकन किया गया है?
इस योजना का दूसरा बड़ा सवाल रोजगार और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ा है। पहले बैच के लगभग 24,400 अग्निवीरों में से अधिकतम 25 फीसदी को नियमित सेवा में बनाए रखने के प्रावधान के अनुसार, बड़ी संख्या में युवाओं को चार साल बाद सेना से बाहर जाना होगा। उन्हें सेवा निधि मिलेगी और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों तथा राज्य पुलिस में अवसरों के लिए विभिन्न व्यवस्थाएं भी घोषित की गई हैं। लेकिन आरक्षण या प्राथमिकता का अर्थ नौकरी की गारंटी नहीं है। वास्तविक रिक्तियों, चयन और नियुक्तियों के आंकड़े ही बताएंगे कि इन युवाओं को कितना लाभ मिला।
दरअसल, सरकार को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि क्या अग्निपथ का एक प्रमुख उद्देश्य रक्षा पेंशन पर भविष्य के खर्च को कम करना था? नियमित सैनिकों की पेंशन और अन्य दीर्घकालिक लाभ सरकारी वित्त पर दायित्व पैदा करते हैं। अग्निवीरों को सामान्य नियमित सैनिकों जैसी पेंशन नहीं मिलती, इसलिए इस मॉडल से भविष्य के वित्तीय दायित्व कम हो सकते हैं। लेकिन केवल इस संभावना से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि योजना सिर्फ पेंशन बचाने के लिए लाई गई। इसकी पुष्टि के लिए निर्णय प्रक्रिया और वित्तीय आकलन सार्वजनिक होने चाहिए। रक्षा बजट में बचत करना गलत नहीं है, लेकिन बचत की कसौटी राष्ट्रीय सुरक्षा होनी चाहिए। यदि कम खर्च में सेना अधिक सक्षम बनती है, तो सुधार का स्वागत किया जाना चाहिए। लेकिन यदि वित्तीय लाभ के बदले अनुभवी सैनिकों की उपलब्धता, प्रशिक्षण की निरंतरता या जवानों के मनोबल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, तो नीति की समीक्षा अनिवार्य है।
बहरहाल, अब समय आ गया है कि सरकार अग्निपथ योजना की स्वतंत्र समीक्षा कराई जाए। नियमित सेवा में चयन का अनुपात सैन्य जरूरतों के अनुसार तय हो, रोजगार संबंधी घोषणाओं के बजाय वास्तविक नियुक्तियों का हिसाब दिया जाए और योजना के वित्तीय तथा परिचालन परिणाम सार्वजनिक किए जाएं। सेना का आधुनिकीकरण जरूरी है, लेकिन सैनिक को खर्च की मद समझना खतरनाक है। देश की रक्षा केवल आधुनिक हथियारों से नहीं होती, बल्कि उन जवानों से होती है जो प्रशिक्षण, अनुभव और मनोबल के साथ सीमाओं पर खड़े रहते हैं। अग्निपथ की सफलता इस बात से तय नहीं होगी कि सरकार ने पेंशन पर कितना पैसा बचाया, बल्कि इससे कि भारतीय सेना कितनी सक्षम हुई और देशसेवा करने वाले युवाओं का भविष्य कितना सुरक्षित बना।
(लेखक “दैनिक भास्कर” के राजनीतिक संपादक हैं)
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