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    Homeअतिथि लेखकअरावली का संरक्षण भारत के पर्वतों के लिए प्रेरक है

    अरावली का संरक्षण भारत के पर्वतों के लिए प्रेरक है

    पृथ्वी दिवस पर अरावली के मुद्दों पर राजेंद्र सिंह से बातचीत सुनिए इस लिंक को क्लिक करें – https://www.youtube.com/watch?v=eFyIlEfYNWY
    अरावली पर्वतमाला मरुस्थलीय विस्तार और उत्तर भारत के उपजाऊ मैदानों के बीच प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने का कार्य करती रही है

    राजेंद्र सिंह, जलपुरुष 

    अरावली केवल एक पर्वतमाला नहीं है, बल्कि उत्तर-पश्चिम भारत की पारिस्थितिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवनरेखा है। सदियों से यह पर्वतमाला मरुस्थलीय विस्तार और उत्तर भारत के उपजाऊ मैदानों के बीच प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने का कार्य करती रही है। यही कारण है कि भारत का सर्वोच्च न्यायालय भी अरावली को “उत्तर-पश्चिम भारत के हरित फेफड़े” के रूप में देखता है। यह पर्वतमाला न केवल जैव विविधता और जल स्रोतों की संरक्षक है, बल्कि लाखों लोगों की आजीविका और पर्यावरणीय सुरक्षा का आधार भी है।

    अरावली की भू-वैज्ञानिक संरचना अत्यंत प्राचीन और खनिज संपदा से समृद्ध है। लेकिन यही समृद्धि लंबे समय से इसके लिए संकट का कारण भी बनी हुई है। अनियंत्रित खनन, वनों की कटाई, शहरी विस्तार और संसाधनों के अत्यधिक दोहन ने इस नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर खतरे में डाल दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने विभिन्न निर्णयों में स्पष्ट रूप से कहा है कि पर्यावरणीय सुरक्षा को प्रशासनिक लापरवाही या नीतिगत अस्पष्टता के आधार पर कमजोर नहीं किया जा सकता।

    वर्ष 1991 से न्यायालय अरावली क्षेत्र में खनन और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मामलों पर लगातार सुनवाई करता रहा है। न्यायालय ने प्रारंभिक निर्णयों में यह स्पष्ट किया कि जिन क्षेत्रों को पहले से कानूनी संरक्षण प्राप्त है, उन्हें खनन अथवा अन्य पर्यावरण-क्षतिकारक गतिविधियों के लिए नहीं खोला जा सकता। इसी क्रम में भारतीय पर्यावरणीय न्यायशास्त्र में एहतियाती सिद्धांत, सार्वजनिक न्यास सिद्धांत, पारिस्थितिक जोखिम तथा विशेषज्ञ-सहायता प्राप्त न्यायिक निर्णयों जैसी महत्वपूर्ण अवधारणाएँ विकसित हुईं।

    अरावली संरक्षण का सबसे जटिल पक्ष इसकी परिभाषा को लेकर बना विवाद रहा है। विभिन्न समितियों और विशेषज्ञ समूहों के बीच लंबे समय से इस बात पर मतभेद रहे हैं कि अरावली की वास्तविक सीमा और स्वरूप क्या है। न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत प्रतिवेदनों में भी कई असहमतियाँ सामने आईं, जिनसे यह स्पष्ट हुआ कि यदि परिभाषा अस्पष्ट रही तो संरक्षण की प्रक्रिया भी कमजोर पड़ सकती है।

    इसी संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय ने 20 नवंबर 2025 के अपने महत्वपूर्ण निर्णय में “अरावली पर्वतमाला की परिभाषा तथा दिल्ली, हरियाणा, गुजरात और राजस्थान में उसके समुचित संरक्षण” को एक गंभीर संवैधानिक और पर्यावरणीय प्रश्न माना। न्यायालय ने उस समिति की रिपोर्ट को स्वीकार किया, जिसमें अरावली की एक परिभाषा निर्धारित की गई थी। बाद में न्यायालय ने यह भी दर्ज किया कि इसी परिभाषा के आधार पर यह अनुशंसा की गई कि नव-निर्धारित अरावली क्षेत्रों में नई खनन पट्टियाँ प्रदान न की जाएँ।

    हालाँकि, 29 दिसंबर 2025 के आदेश में न्यायालय ने गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यदि किसी परिभाषा का पर्याप्त परीक्षण नहीं किया गया, तो वह अस्पष्टता और अनपेक्षित परिणाम उत्पन्न कर सकती है। न्यायालय ने माना कि अधूरी या गलत परिभाषा ऐसे नियामकीय शून्य पैदा कर सकती है, जो अरावली की पारिस्थितिक अखंडता को कमजोर कर दें। इसलिए न्यायालय ने यह आवश्यक माना कि किसी भी रिपोर्ट को लागू करने से पहले स्वतंत्र विशेषज्ञों की निष्पक्ष राय ली जाए और सभी हितधारकों को प्रक्रिया में शामिल किया जाए।

    न्यायालय का यह दृष्टिकोण केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि भविष्य के पर्यावरणीय और संवैधानिक संकटों को रोकने का प्रयास है। क्योंकि यदि किसी भू-भाग को कानूनी परिभाषा के आधार पर संरक्षण से बाहर कर दिया जाता है, तो वह क्षेत्र धीरे-धीरे खनन, विघटन और विनाशकारी गतिविधियों के लिए खुल सकता है। यही कारण है कि अरावली का प्रश्न केवल भूगोल का विषय नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 और 48A, अंतरपीढ़ी समानता, एहतियाती सिद्धांत और सार्वजनिक न्यास सिद्धांत से जुड़ा हुआ विषय बन जाता है।

    यह समझना आवश्यक है कि किसी भू-भाग को “त्याज्य” घोषित करना केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं हो सकता। प्रकृति का कोई भी हिस्सा केवल इसलिए महत्वहीन नहीं हो जाता कि उसमें आर्थिक दोहन की संभावना अधिक है। पर्वत, वन और जल स्रोत केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन और भविष्य की सुरक्षा के आधार हैं। अरावली का संरक्षण इसी व्यापक दृष्टिकोण की मांग करता है।

    वास्तव में अरावली का संघर्ष केवल एक पर्वतमाला को बचाने का संघर्ष नहीं है। यह उस सोच के बीच संघर्ष है, जिसमें एक ओर प्रकृति को केवल आर्थिक संसाधन मानकर उपयोग करने की प्रवृत्ति है और दूसरी ओर प्रकृति को जीवन, संतुलन और आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों के रूप में देखने की संवेदनशील दृष्टि है।

    आज जब जलवायु परिवर्तन, जल संकट और पर्यावरणीय असंतुलन पूरी दुनिया के सामने चुनौती बनकर खड़े हैं, तब अरावली का संरक्षण भारत के सभी पर्वतीय क्षेत्रों के लिए प्रेरणा बन सकता है। यदि अरावली को संवैधानिक मूल्यों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर सुरक्षित किया जाता है, तो यह केवल राजस्थान, हरियाणा या दिल्ली की ही नहीं, बल्कि पूरे भारत की पर्यावरणीय सुरक्षा की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम होगा।

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