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    अलवर की डॉ. कुमकुम कपूर को भूटान-भारत अंतरराष्ट्रीय साहित्य शिरोमणि सम्मान

    थिम्फू में आयोजित साहित्य-सांस्कृतिक मैत्री सम्मेलन में कविता की सशक्त प्रस्तुति, भारत-भूटान मैत्री को समर्पित रहा आयोजन

    अलवर। भूटान की राजधानी थिम्फू में 17 से 22 सितंबर 2026 तक आयोजित भूटान-भारत अंतरराष्ट्रीय साहित्य-सांस्कृतिक मैत्री सम्मेलन में अलवर की शिक्षाविद् एवं साहित्यकार डॉ. कुमकुम कपूर ने सहभागिता की। सम्मेलन के दौरान उन्होंने अपनी कविता आईना भी अब मौन है की प्रस्तुति देकर साहित्यिक अभिव्यक्ति से उपस्थित प्रतिभागियों को प्रभावित किया।

    सम्मेलन में डॉ. कुमकुम कपूर को भूटान-भारत अंतरराष्ट्रीय साहित्य शिरोमणि सम्मान से सम्मानित किया गया। यह सम्मान मिलने से अलवर के साहित्यिक एवं शैक्षणिक क्षेत्र से जुड़े लोगों में हर्ष का माहौल है।

    विभिन्न राज्यों के साहित्यकारों ने लिया हिस्सा

    कार्यक्रम का आयोजन प्रगति विचार एवं साहित्य मंच की ओर से किया गया। सम्मेलन में भारत के विभिन्न राज्यों से आए साहित्यकारों के साथ भूटान के साहित्यकारों ने भी सहभागिता की। आयोजन का उद्देश्य साहित्य और संस्कृति के माध्यम से दोनों देशों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों को और मजबूत करना रहा।

    डॉ. कुमकुम कपूर ने सम्मेलन में अपनी कविता ‘आईना भी अब मौन है’ का पाठ किया। उनकी प्रस्तुति को सम्मेलन की साहित्यिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया।

    साहित्य और संस्कृति का रहा संगम

    सम्मेलन का संयोजन डॉ. हरेंद्र हर्ष ने किया, जबकि राजपाल यादव ने मंच संचालन किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. वीरेन्द्र सिंह वीर ने की।

    भूटान के ब्रॉडकास्टिंग प्रभारी डॉ. हरमन रॉय मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार डॉ. लक्ष्मी दास शर्मा तथा भूटान के साहित्यकार हिमरे अच्युत विशिष्ट अतिथि रहे। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सारंगा ने सम्मेलन की गतिविधियों और प्रस्तुतियों की विस्तार से समीक्षा की।

    भूटान के कलाकारों ने दी सांस्कृतिक प्रस्तुति

    सम्मेलन के दौरान भूटान के प्रतिनिधियों ने भारत-भूटान के मैत्रीपूर्ण संबंधों को बढ़ावा देने वाली सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी दीं। इन प्रस्तुतियों के माध्यम से भूटान की सांस्कृतिक परंपराओं और दोनों देशों के बीच आपसी सद्भाव को सामने रखा गया।

    डॉ. कुमकुम कपूर को मिले सम्मान को अलवर की साहित्यिक उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। साहित्यिक और शैक्षणिक क्षेत्र से जुड़े लोगों ने उन्हें सम्मान मिलने पर शुभकामनाएं दीं।

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