विनयांजलि सभा में संत जीवन, तप, संयम और आध्यात्मिक योगदान को किया याद, समाजजनों ने अर्पित किए श्रद्धासुमन
अलवर। दिगंबर जैन धर्म के महान तपस्वी एवं आचार्य परम पूज्य आचार्य श्री 108 वर्धमान सागर जी महाराज के 5 जुलाई 2026 को महाराष्ट्र स्थित कुन्तलगिरी सिद्ध क्षेत्र में संलेखना समाधि प्राप्त करने पर मंगलवार को सकल दिगंबर जैन समाज की ओर से श्री दिगंबर जैन अग्रवाल पंचायती मंदिर के सभागार में विनयांजलि सभा आयोजित की गई। सभा में समाज के गणमान्य लोगों ने आचार्य श्री के आध्यात्मिक जीवन, तप, संयम और समाज के प्रति उनके योगदान को स्मरण करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
आचार्य श्री के जीवन पर डाला प्रकाश
सभा को संबोधित करते हुए श्री दिगंबर जैन अग्रवाल पंचायती मंदिर के मंत्री कैलाश चंद जैन ने आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के जीवन पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि आचार्य श्री का जन्म 18 सितंबर 1950 को भाद्रपद शुक्ल सप्तमी के दिन हुआ था। उनका बाल्यकाल का नाम यशवंत था। मात्र 19 वर्ष की आयु में वर्ष 1969 में श्री महावीरजी में आचार्य श्री धर्मसागर जी महाराज से उन्होंने दीक्षा ग्रहण कर संयममय जीवन का मार्ग अपनाया।
तप, संयम और साधना की रही प्रेरणादायी यात्रा
उन्होंने बताया कि आचार्य श्री, आचार्य श्री सन्मति सागर जी महाराज के प्रमुख शिष्य थे। कठोर तपस्या, गहन विद्वता और संघ संचालन की अद्भुत क्षमता को देखते हुए 18 फरवरी 2011 को उन्हें आचार्य पद से अलंकृत किया गया। वे चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की गौरवशाली आध्यात्मिक परंपरा के प्रतिनिधि थे। उनका संपूर्ण जीवन संयम, समता, साधना और तप की प्रेरणा देता रहेगा।
समाजजनों ने अर्पित किए श्रद्धासुमन
विनयांजलि सभा में खंडेलवाल समाज के अध्यक्ष प्रवीण जैन, पालीवाल जैन समाज के अध्यक्ष राजेंद्र कुमार जैन, बड़तला समाज के अध्यक्ष अधिवक्ता राजेंद्र प्रसाद जैन तथा श्री दिगंबर जैन अग्रवाल पंचायती मंदिर के अध्यक्ष मुकेश कुमार जैन ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए आचार्य श्री को भावपूर्ण विनयांजलि अर्पित की।
सभा में वरिष्ठ उपाध्यक्ष अशोक जैन, हेमचंद जैन, हुकमचंद जैन, प्रशांत जैन सहित बड़ी संख्या में समाज के गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
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