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    आरक्षण पर नई पहल, आयोग ने पूछा- मौजूदा व्यवस्था ठीक है या बदलाव जरूरी?

    पिछड़ा वर्ग आयोग की समीक्षा बैठक में सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों का विश्लेषण, निष्पक्ष अध्ययन के बाद सरकार को सौंपी जाएगी रिपोर्ट

    अंबेडकरनगर। उत्तर प्रदेश के अंबेडकरनगर जिले में स्थानीय निकायों और त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में पिछड़ी जातियों के प्रतिनिधित्व तथा आरक्षण नीति की जमीनी हकीकत परखने के लिए ‘उत्तर प्रदेश राज्य स्थानीय ग्रामीण निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग’ की पांच सदस्यीय उच्च स्तरीय कमेटी ने दौरा किया। न्यायमूर्ति व आयोग के माननीय अध्यक्ष राम औतार सिंह के नेतृत्व में न्यू-सर्किट हाउस के सभागार में एक महत्वपूर्ण समीक्षा बैठक आयोजित की गई।

    इस बैठक में जिले के निवर्तमान जिला पंचायत सदस्यों, ग्राम प्रधानों और ब्लॉक प्रमुखों सहित तमाम स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। बैठक के दौरान आयोग के अध्यक्ष ने जब जनप्रतिनिधियों से आरक्षण की वर्तमान स्थिति और उनकी आवश्यकताओं पर सीधे सवाल किए, तो उपस्थित सभी प्रतिनिधियों ने एक सुर में पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण का दायरा (कोटा) बढ़ाने की पुरजोर मांग की। हालांकि, वर्तमान राजनैतिक भागीदारी और प्रतिनिधित्व को लेकर सभी ने संतोष व्यक्त किया।

    अंबेडकरनगर: जिले में 55 प्रतिशत है पिछड़ा वर्ग की आबादी, आयोग ने ब्लॉक स्तर के अधिकारियों से जुटाए सामाजिक आंकड़े

    बैठक की शुरुआत में आयोग के अध्यक्ष ने वहां मौजूद प्रशासनिक अधिकारियों को इस विशेष आयोग के गठन के संवैधानिक उद्देश्यों, कार्यप्रणाली और उनके दायित्वों के बारे में विस्तृत दिशा-निर्देश दिए। उन्होंने जिले में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की कुल जनसंख्या, उनकी सामाजिक व आर्थिक स्थिति, पिछड़ेपन के मुख्य कारण और स्थानीय निकायों में उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़े आधिकारिक आंकड़ों की गहन समीक्षा की।

    प्रशासन द्वारा प्रस्तुत किए गए जनसंख्या के आंकड़ों के अनुसार:

    • कुल आबादी: जिले की कुल आबादी 20,38,840 दर्ज की गई है।
    • पिछड़ा वर्ग (ओबीसी): इसमें पिछड़ा वर्ग की जनसंख्या सर्वाधिक 11,23,445 है, जो कि जिले की कुल आबादी का लगभग 55 प्रतिशत है।
    • अनुसूचित जाति व जनजाति: जिले में अनुसूचित जाति (एससी) की जनसंख्या 5,44,251 है, जबकि अनुसूचित जनजाति (एसटी) की संख्या महज 659 है।

    इस दौरान आयोग के सदस्यों ने सभी खंड विकास अधिकारियों (बीडीओ) से उनके संबंधित विकासखंडों में ओबीसी वर्ग की वास्तविक सामाजिक स्थिति और उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व का ब्लॉकवार ब्योरा तलब किया।

    जनप्रतिनिधियों ने दिए लिखित सुझाव, निष्पक्ष अध्ययन के बाद उत्तर प्रदेश सरकार को सौंपी जाएगी अंतिम रिपोर्ट

    बैठक के दौरान विभिन्न क्षेत्रों से आए जनप्रतिनिधियों ने वर्तमान में लागू त्रिस्तरीय आरक्षण व्यवस्था को और अधिक व्यावहारिक व पारदर्शी बनाने के लिए अपने लिखित सुझाव और महत्वपूर्ण आपत्तियां आयोग के समक्ष प्रस्तुत कीं। आयोग के अध्यक्ष ने सभी को आश्वस्त किया कि प्राप्त हुए तमाम तथ्यों, आंकड़ों और जन-सुझावों के आधार पर एक पूर्णतः निष्पक्ष, व्यावहारिक और अनुभवजन्य (एम्पायरिक) अध्ययन सुनिश्चित किया जाएगा। इस अध्ययन के आधार पर तैयार की जाने वाली महत्वपूर्ण संस्तुतियां (सिफारिशें) जल्द ही उत्तर प्रदेश शासन को आधिकारिक तौर पर उपलब्ध कराई जाएंगी।

    उच्चाधिकारियों की रही गरिमामयी मौजूदगी, प्रेसवार्ता में 27% आरक्षण के वर्तमान प्राविधान पर हुई चर्चा

    इस उच्च स्तरीय बैठक में आयोग के सम्मानित सदस्य संतोष कुमार विश्वकर्मा, बृजेश कुमार, एसपी सिंह और डॉ. अरविंद कुमार चौरसिया विशेष रूप से उपस्थित रहे। प्रशासनिक पक्ष की ओर से जिले की जिलाधिकारी ईशा प्रिया, मुख्य विकास अधिकारी (सीडीओ) आनंद शुक्ल, जिला पंचायत राज अधिकारी (डीपीआरओ) उपेंद्र पांडेय, जिला पंचायत के अपर मुख्य अधिकारी एके सिंह तोमर सहित सभी ब्लॉकों के खंड विकास अधिकारी, सहायक विकास अधिकारी (पंचायत) और विभिन्न ग्राम पंचायतों के प्रशासक मौजूद रहे।

    बैठक के समापन के बाद आयोजित एक औपचारिक प्रेसवार्ता में आयोग के अध्यक्ष ने मीडिया को ब्रीफ करते हुए बताया कि इस राष्ट्रव्यापी कवायद का मुख्य उद्देश्य जिलों का दौरा कर यह पता लगाना है कि धरातल पर पिछड़ा वर्ग की वास्तविक स्थिति क्या है, उनकी कुल जनसंख्या कितनी है और उनका सामाजिक-आर्थिक जीवन स्तर कैसा है। इन सभी इनपुट्स को संकलित कर शासन को अंतिम रिपोर्ट भेजी जाएगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वर्तमान कानूनी ढांचे के तहत पिछड़ा वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का प्राविधान लागू है, जिसकी हर स्तर पर समीक्षा की जा रही है।

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