भाजपा व कांग्रेस बगावत के खौफ से अंतिम समय तक भी अधिकृत सूची जारी करने से कतराएं
भीलवाड़ा। राजस्थान में भीलवाड़ा सहित 300 से अधिक नगरीय निकायों के चुनाव के लिए नामांकन पत्र भरने का कार्य तो सोमवार को पूरा हो गया पर इसने राजनीतिक पार्टियों के अनुशासन, निष्ठा ओर समयबद्धता की कलाई खोलकर रख दी। नामांकन पत्र भरने की अंतिम समय सीमा से कुछ मिनट पहले जिस तरह पार्टी सिंबल निर्वाचन अधिकारियों तक पहुचाएं गए ओर भीलवाड़ा सहित कई जगह तो प्रत्याशियों की अधिकृत सूचियां ही समय सीमा गुजरने के बाद जारी हुई उसने राजनीतिक दलों के अंदर बैठे बगावत के डर को फिर जगजाहिर कर दिया। एनवक्त पर सिंबल जमा कराने की इस आपधापी में भीलवाड़ा में तो 17 वार्डो में कांग्रेस प्रत्याशियों के सिंबल ही जमा नहीं होने से उनका राजनीतिक भाग्य चमकने से पहले ही मुरझाने लगा।
प्रत्याशियों के नाम घोषित करने पर पार्टी के ही दूसरे दावेदारों ओर कार्यकर्ताओं के बगावत का डर देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी प्रतिपक्षी कांग्रेस को ही नहीं बल्कि पार्टी विद डिफेरेंस का नारा लगा दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा करने वाली सत्ताधारी भाजपा को भी लग रहा था। ये डर इतना गहरा था कि जो प्रदेश स्तरीय नेता ओर जनप्रतिनिधि चुनाव में नामांकन प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही सूचियां जारी कर देने का दावा कर रहे थे वह नामांकन भरने की प्रक्रिया समाप्त होने तक भी नाम घोषित करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे।
वार्ड स्तरीय चुनावों में अधिकृत प्रत्याशियों की सूचियां जारी करने में विलंब की पराकाष्टा ये साबित कर रही है कि भाजपा हो या कांग्रेस किसी को भी अपने कार्यकर्ताओं व दावेदारों की वफादारी ओर निष्ठा पर भरोसा नहीं रह गया है। इस बात का विश्वास ही नहीं है कि वह जिनको अधिकृत प्रत्याशी घोषित करेंगे उनका कोई विरोध नहीं होगा या पार्टी कार्यकर्ता व अन्य दावेदार उन्हें सहज रूप से स्वीकार कर लेंगे।
टिकट वितरण करने वालों के मन में समाया यह डर बताता है कि अधिकृत प्रत्याशी के नाम पर आम सहमति के उनके दावे मात्र कागजी है ओर अंदर से जानते है कि उनके द्वारा तय नाम का विरोध विपक्षी प्रत्याशी बाद में करेंगे पहले विरोध का आगाज वह लोग करेंगे जिन्हें पार्टी अपना निष्ठावान समर्पित कार्यकर्ता बताती है।
विरोध एवं बगावत की इस आग के लिए मात्र अधिकृत प्रत्याशी की खिलाफत करने वाले कार्यकर्ता ही जिम्मेदार नहीं होते बल्कि वह नेता ओर पदाधिकारी अधिक जिम्मेदार होते है जो टिकट बांटते समय कार्यकर्ता की योग्यता व निष्ठा की अनदेखी कर बड़े नेताओं की सिफारिश ओर परिवारवाद व वंशवाद, जातिवाद आदि में उलझकर उसके ‘‘सपनों की हत्या’’ कर देते है।
जब किसी के सपने धराशाही हो जाते है ओर उससे कम योग्यता व मेहनत करने वालों को अधिकृत प्रत्याशी का तमगा दिया जाता है तो बगावत रूपी लावा बाहर आता है। इस लावे की गर्मी से कुर्सियां नहीं पिघल जाए इसीलिए बड़े नेता प्रत्याशियों की अधिकृत सूची अंतिम समय से पहले जारी करने से घबराते है ओर नजरे बचाकर चुपचाप सिंबल जमा कराने में ही अपनी खैर मनाते है।
नगरीय निकाय चुनाव की नामांकन प्रक्रिया ने राजनीतिक दल के प्रति बिना किसी स्वार्थ के समर्पित रहने के दावों की पोल खोल दी है ओर साबित कर दिया है कि उनकी निष्ठा दल से ज्यादा चुनावी टिकट में होती है। टिकट मिल जाए तो अपनी पार्टी में दुनिया भर की अच्छाईयां नजर आती है ओर टिकट कट जाए या नहीं मिल पाए तो उसमें दुश्मन से भी ज्यादा कमियां नजर आती है।
ये मंजर बताता है कि निष्ठा ओर समर्पण की बाते अब मात्र भाषणों में अच्छी लगती है राजनीतिक धरातल पर कब दुश्मन दोस्त ओर कब दोस्त दुश्मन बन जाए ये कोई नहीं जानता। राजनीति के इस बाजार में सब बाजारू लगते है सिद्धांतों की बात करने वाले यहां किसी कॉमेडी के पात्र लगते है।
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