विनोबा-जे.पी. की प्रेरणा :चम्बल में बदलाव की गाथा
विनोबा और जे. पी. की प्रेरणा से राजेन्द्र सिंह का ऐतिहासिक अभियान
लेखक : गोपालसिंह, तरुण भारत संघ
प्रेरणा के बीज: विनोबा और जे. पी. का योगदान
जो बीज विनोबा और जे. पी. ने बोया, उसे वृक्ष बनाकर राजेन्द्र सिंह ने चम्बल में बदलाव किया। सर्वप्रथम 1960 में विनोबा की प्रेरणा से 20 व्यक्तियों ने अपनी बन्दूकें छोड़ीं। 1972 में सैकड़ों व्यक्तियों ने महात्मा गांधी की प्रतिमा के सामने, जे. पी. पर विश्वास करके, सुब्बाराव जी के प्रयास से बन्दूकें छुड़वाईं।
सरकार ने उनके पुनर्वास के मिश्रित सफल प्रयास किये थे, किन्तु केवल कुछ बड़े नामधारी और बड़ी बन्दूकों वालों का ही पुनर्वास हुआ था। पी. वी. राजगोपाल और रण सिंह भी पुनर्वास के प्रयास करते रहे, परन्तु पुनर्वास पर अभी भी प्रश्न बना रहा। सरकार ने पुनर्वास की जिम्मेदारी लेकर ही बन्दूकें छुड़वाने की कार्यवाही की थी, किन्तु सरकार तब अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर सकी।
राजेन्द्र सिंह का अनूठा मार्ग: जल से जीवन की ओर
1990 में राजेन्द्र सिंह ने पुनर्वास की कोई भी जिम्मेदारी लिए बिना एक सर्वथा नया मार्ग अपनाया। उन्होंने पहले बन्दूकधारियों की पत्नियों के माध्यम से उनके खेतों पर जल संरक्षण करवाकर परिवारों को आर्थिक रूप से सक्षम बनाया। पानी मिलने पर महिलाएं खेती और पशु-पालन करने लगीं, जिससे आर्थिक समृद्धि आई।
आर्थिक समृद्धि देखकर बन्दूकधारियों की पत्नियों ने अपने पतियों को घर लौटने का अहसास कराया। जब उन्हें बन्दूक छोड़ने के बाद की कार्यवाही का विश्वास हुआ, तो बाग़ी वापस अपने-अपने घर आने लगे। जगदीश (निर्भय सिंह) के केस ने सबको विश्वास दिलाया और तब बन्दूकें छुटने का सिलसिला शुरू हुआ।
भगवती और जगदीश: बदलाव की पहली इकाई
इस बदलाव का बीड़ा सबसे पहले भगवती ने उठाया। उसने अपने खेतों पर जल संरक्षण कार्य किया और जल-व्यवस्था होने पर सबसे पहले अपने पति जगदीश (निर्भय सिंह) को बन्दूक छोड़ने के लिए तैयार किया। इसे देखकर अन्य बन्दूकधारियों द्वारा भी बन्दूकें छोड़कर खेती करने की एक मुहिम चल पड़ी।
“सुनो! पहले हम डरते थे, डराते थे; मरते थे, मारते थे पर अब हम समझदार, पानीदार बनकर इज्जतदार बन गये हैं। आपको भी यदि मेरे जैसा बनना है, तो बन्दूकें छोड़ो, वर्षा-जल को पकड़ो और खेती करो। सुख का जीवन जीओ।”
— जगदीश निर्भय सिंह
जगदीश अब राजेन्द्रसिंह के साथ रहने लगा और गांव-गांव जाकर अपने अनुभव सुनाने लगा। राजेन्द्रसिंह केवल खेती और पानी की बातें करते थे तथा जो बन्दूक छोड़ने के लिए तैयार होता, उसे फरारी से छुड़वाकर अदालत से मुक्ति दिलाते थे। इस प्रक्रिया से एक के बाद एक अपने आप शान्ति और संतोष का रास्ता पकड़ने लगे।
करौली-धौलपुर: बन्दूक से हल की ओर
करौली-धौलपुर तीन राज्यों उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के बन्दूकधारियों को प्रशिक्षित करने वाले केन्द्र और क्षेत्र रहे हैं। यहाँ के लोग जीवन, जीविका और जमीर बचाने का बन्दूक के अलावा दूसरा कोई रास्ता ही नहीं जानते थे। इन्होंने बन्दूक को ही अपनी सबसे बड़ी इज्जत दिलाने वाली मान लिया था; इनके लिए हल, फावड़े और खेती के औजार बे-इज्जती का प्रतीक थे।
तरुण भारत संघ के चमन सिंह, रणवीर सिंह, श्रवण शर्मा, छोटेलाल मीणा, गोपाल सिंह, मुकेश और देशराज आदि ने भी इन पर विश्वास किया, तो उनका विश्वास भी तरुण भारत संघ के काम से बन्दूक छोड़कर पानी का काम करना आसान लगने लगा। पहले लज्जा सिंह, बच्ची सिंह जैसे बन्दूकधारियों ने बन्दूकें छोड़ीं, फिर नई उम्र के युवा भी छोड़ने लगे।
इकाई से हजारों तक: बदलाव की यात्रा
बन्दूक छोड़कर खेती करने वालों की इकाई केवल भगवती और जगदीश बने। उनकी दहाई में लज्जा, बच्चू, नाहर, निर्भय बने, तो सैकड़े में नये प्रशिक्षित युवा और हजारों संख्या में वे लोग बने जो प्रशिक्षण ले ही रहे थे। इकाई और दहाई से प्रेरणा लेकर इन लोगों ने बन्दूक का प्रशिक्षण रोक दिया और पानी का प्रशिक्षण लेने लगे।
बन्दूक छोड़ने वालों की इकाई पर स्वयं राजेन्द्र सिंह ने काम किया। दहाई बनाने का काम तरुण भारत संघ के कार्यकर्ताओं ने किया। सैकड़ा बनाने का काम उन बन्दूकधारियों ने किया जिन्होंने बन्दूकें छोड़ दी थीं। तत्पश्चात् हजारों में बदलने का काम वातावरण निर्माण से स्वतः हो गया — प्रेम और विश्वास ने वह वातावरण बनाया।
महिलाओं की भूमिका: बदलाव की असली नायिकाएं
चम्बल के इस काम को सफल बनाने का श्रेय इस क्षेत्र की महिलाओं को ही जाता है। महिलाओं ने अपने-अपने पतियों व हजारों अविवाहित युवाओं को अपने घर-गांव में रहकर खेती का काम करने हेतु, वर्षा जल संरक्षण का प्रभाव आँखों से दिखाकर तैयार किया था।
सम्पत्ता जैसी महिलाएं तो पहले अपने पति को तैयार करके फिर अन्य युवाओं को भी तैयार करने में जुट गईं। सम्पत्ता व भगवती जैसी सैकड़ों महिलाओं ने बहुत ही सरल-सहज तरीके से राजेन्द्र का काम आसान किया था।
परिणाम: चम्बल में नवजीवन
अब साढ़े छः हजार से अधिक लोग चम्बल में बन्दूक चलाने का काम छोड़कर जोहड़, तालाब, बांध, पोखर निर्माण के काम करके स्वावलम्बी खेती और पशु-पालन कर रहे हैं। इनके कामों से चम्बल क्षेत्र में दर्जनों छोटी-छोटी सहायक नदियाँ शुद्ध-सदानीरा बनकर बह रही हैं।
राजेन्द्र ने इस काम की चुनौतियों को सहजता से स्वीकार करके रात-दिन चम्बल क्षेत्र के गांवों में रहकर पिछले 36 वर्षों में इस कार्य को साकार किया। यह समर्पण उत्सव नहीं, बल्कि कर्तव्य निभाने वाला काम था। इस काम में राजेन्द्र ने सबका साथ, प्रेम, सम्मान और विश्वास प्राप्त किया।
पानी प्रेम बाँटता है — जब सच्चे प्रेम से सम्मान और विश्वास मिला, तो सफलता मिली।
जब सूखी और मरी हुई सरिता पुनः बहने लगती है, तब वहाँ की सभ्यता और संस्कृति समृद्ध बन जाती है।
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