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    अलवर : कम उम्र में बड़े आदर्श, जैन बच्चों में संस्कारों की मजबूत नींव

    छोटी उम्र में ही जैन बच्चों को दिए जा रहे हैं बड़े संस्कार

    प्रस्तुति: हरीश जैन,  वरिष्ठ पत्रकार | अलवर

    अलवर शहर में जैन समाज द्वारा बच्चों में धार्मिक, नैतिक और आध्यात्मिक संस्कारों का बीजारोपण करने की एक प्रेरणादायक पहल पिछले कई वर्षों से निरंतर जारी है। यहां छोटी उम्र के बच्चों को न केवल जैन धर्म के सिद्धांतों से परिचित कराया जा रहा है, बल्कि उन्हें पूजा और अभिषेक जैसी विधियों का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है।

    रविवार की सुबह अलवर के जैन मंदिर में एक अलग ही दृश्य देखने को मिलता है। नन्हे-नन्हे बच्चे उत्साह के साथ अपने घरों से निकलकर मंदिर पहुंचते हैं, जहां उनके लिए पहले से ही पूजा की थाली सजी होती है। बच्चे अनुशासन के साथ बैठकर जैन पूजा पद्धति सीखते हैं और उसे आत्मसात करने का प्रयास करते हैं। कम उम्र में इतने गहरे संस्कार देना वास्तव में एक उल्लेखनीय पहल है।

    इस कार्य में सक्रिय भूमिका निभा रहे समाजसेवी अनिल जैन सौरखा वाले बताते हैं कि इस पहल की शुरुआत संत शिरोमणि जैनाचार्य आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के सुशिष्य मुनि श्री आर्जव सागर महाराज की प्रेरणा से 1 मार्च 2010 को की गई थी। उसी दिन जैन भवन, अलवर स्थित श्री दिगम्बर जैन पारसनाथ चौबीसी मंदिर परिसर में आचार्य श्री विद्यासागर सर्वोदय ज्ञान पाठशाला की स्थापना की गई। तभी से यह पाठशाला नियमित रूप से संचालित हो रही है।

    इस पाठशाला के संचालन में समाजसेवी अजित जैन का भी विशेष योगदान है, जो व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से संभालते हैं। यह पाठशाला श्री दिगम्बर जैन अग्रवाल पंचायती मंदिर के अधीन संचालित होती है और श्रमण संस्कृति संस्थान, सांगानेर बोर्ड में पंजीकृत है। प्रतिदिन शाम 6:30 से 7:30 बजे तक यहां बच्चों को जैन धर्म, नैतिकता, आध्यात्मिकता और सामाजिक मूल्यों से जुड़े पाठ पढ़ाए जाते हैं।

    समय के साथ इस पहल को आधुनिक स्वरूप भी दिया गया है। 14 दिसंबर 2025 को यहां डिजिटल पाठशाला का विधिवत उद्घाटन किया गया, जिससे बच्चों को आधुनिक तकनीक के माध्यम से भी शिक्षा दी जा सके। विशेष अवसरों पर पाठशाला के बच्चे सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत कर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन भी करते हैं।

    प्रत्येक रविवार को आयोजित पूजा कार्यक्रम में बच्चों की संख्या अब लगभग 80 तक पहुंच चुकी है। पूजा के समापन के बाद बच्चों को अल्पाहार और पुरस्कार भी दिए जाते हैं, जिससे उनका उत्साह और बढ़ता है। आठ वर्ष से अधिक आयु के बच्चे अभिषेक विधि में भी भाग लेते हैं और कई बच्चे तो इतने दक्ष हो चुके हैं कि वे बड़ों को भी सिखाने की क्षमता रखते हैं।

    इस पूरे कार्य में समाजसेवी अशोक जैन व्रती और अनिल जैन सौरखा वाले बच्चों को पूजा और अभिषेक की विधियां सिखाने में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। वहीं, शाम के समय जैन भवन में समाज की महिलाएं—सुनीता जैन, प्रमिला जैन, अनीता जैन, नीना जैन, मंजू जैन, अमीषा जैन, मंजू जैन सोरखा और नूतन जैन—बच्चों को जैन धर्म की शिक्षा प्रदान करती हैं।

    सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि इस पूरे कार्य में जुड़े सभी प्रशिक्षक निःस्वार्थ भाव से सेवा दे रहे हैं और समाज से किसी प्रकार की धनराशि नहीं ली जाती।

    अलवर की यह पहल न केवल जैन समाज के लिए बल्कि पूरे समाज के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण है, जो यह दिखाती है कि यदि सही दिशा में प्रयास किए जाएं, तो बचपन से ही संस्कारों की मजबूत नींव रखी जा सकती है।

     

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