राज्यसभा में दो-तिहाई फार्मूले से हुआ विलय, दल-बदल कानून पर छिड़ी बहस
नई दिल्ली। राजनीति में वक्त कितनी जल्दी बदलता है, इसका ताजा उदाहरण राघव चड्ढा हैं। अप्रैल 2026 के इस बड़े राजनीतिक घटनाक्रम में राघव चड्ढा ने राज्यसभा के छह अन्य सांसदों के साथ मिलकर आम आदमी पार्टी से नाता तोड़कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) में विलय की घोषणा कर दी है। इस कदम ने न केवल दिल्ली और पंजाब की राजनीति में हलचल मचा दी है, बल्कि ‘दल-बदल विरोधी कानून’ पर एक नई बहस भी छेड़ दी है।
यह कदम संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत उठाया गया है, जिसमें किसी पार्टी के दो-तिहाई सदस्यों के एक साथ अलग होने पर उनकी सदस्यता सुरक्षित रहती है। राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के कुल 10 सांसदों में से 7 सांसदों के इस फैसले के बाद यह आंकड़ा 70% हो गया, जो आवश्यक सीमा से अधिक है।
इस घटनाक्रम ने दल-बदल विरोधी कानून पर नई बहस छेड़ दी है। दिलचस्प बात यह है कि अगस्त 2022 में राघव चड्ढा ने एक निजी विधेयक पेश कर इस कानून को और सख्त बनाने की मांग की थी। उस प्रस्ताव में विलय के लिए 2/3 के बजाय 3/4 बहुमत की शर्त रखने और दल बदलने वाले नेताओं पर 6 साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लगाने का सुझाव दिया गया था।
भाजपा मुख्यालय में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में चड्ढा ने अपनी पुरानी पार्टी पर निशाना साधते हुए कहा कि उन्होंने 15 वर्षों तक पार्टी को समय दिया, लेकिन अब पार्टी अपने मूल सिद्धांतों से भटक चुकी है। उन्होंने कहा कि वे “गलत पार्टी में सही व्यक्ति” महसूस कर रहे थे और अब वे उस दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं, जहां वे अपने सिद्धांतों के अनुसार काम कर सकें।
भाजपा में शामिल होने वाले अन्य सांसदों में संदीप पाठक, अशोक मित्तल, स्वाति मालीवाल, हरभजन सिंह, राजिंदर गुप्ता और विक्रम साहनी शामिल हैं।
इस घटनाक्रम के बाद राज्यसभा में भाजपा की संख्या और मजबूत हुई है, जिसे पार्टी के लिए एक बड़ी राजनीतिक बढ़त माना जा रहा है। वहीं, आम आदमी पार्टी के लिए यह एक बड़ा झटका साबित हो सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम आने वाले समय में दल-बदल कानून और राजनीतिक नैतिकता पर व्यापक बहस को जन्म देगा।
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