लक्ष्मणगढ़ में पंडित लोकेश कुमार की श्रद्धालुओं को सलाह, संकल्प के अनुरूप करें मां की पूजा-पाठ; आत्मसंयम, सात्विकता और लोककल्याण की भावना को बताया पर्व का आधार
लक्ष्मणगढ़। शारदीय नवरात्र का पर्व रविवार से शुरू होने जा रहा है। सनातन धर्म में मां आदिशक्ति भगवती दुर्गा की उपासना के ये नौ दिन श्रद्धा, साधना और आत्मसंयम के प्रतीक माने जाते हैं। नवरात्र के पहले दिन श्रद्धालु शुभ मुहूर्त में घटस्थापना कर व्रत का संकल्प लेते हैं और अखंड ज्योति प्रज्वलित कर मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना करते हैं।
योग शिक्षक पंडित लोकेश कुमार के अनुसार, नवरात्र केवल शक्ति की उपासना का पर्व नहीं, बल्कि श्रद्धा, अनुशासन और आत्मसंयम का अवसर भी है। पूजा-पाठ के साथ व्रत के नियमों का पालन करना और सात्विक जीवनशैली अपनाना भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
व्रत में संयम और नियमों का रखें ध्यान
पंडित लोकेश कुमार ने बताया कि शारदीय नवरात्र में मां दुर्गा की आराधना के दौरान श्रद्धा, निष्ठा और संयम का विशेष महत्व है। व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को अपनी परंपरा और संकल्प के अनुरूप पूजा-विधि अपनानी चाहिए। व्रत शुरू करने से पहले ही उसकी पद्धति तय कर लेना उपयोगी रहता है।
उन्होंने कहा कि व्रत के दौरान अपनी सेहत और शारीरिक जरूरतों का ध्यान रखना भी जरूरी है। फलाहार या सात्विक भोजन का चयन अपनी क्षमता और परंपरा के अनुसार करना चाहिए, ताकि पूजा-पाठ के साथ स्वास्थ्य का भी ध्यान रखा जा सके।
पहली बार व्रत रखने वाले पहले तय करें पद्धति
पहली बार नवरात्र का व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को व्रत की अलग-अलग परंपराओं की जानकारी लेकर संकल्प करना चाहिए। कुछ लोग नौ दिनों तक फलाहार करते हैं, जबकि कुछ निर्धारित समय पर सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं।
पंडित लोकेश कुमार ने बताया कि पारिवारिक परंपरा के अनुसार कलश स्थापना और संकल्प के समय व्रत की विधि निर्धारित की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यदि कोई श्रद्धालु पहले दिन से नौ दिनों तक फलाहार का संकल्प लेता है, तो उसे अपनी निर्धारित व्रत-पद्धति का पालन करना चाहिए। इसी तरह, सेंधा नमक के उपयोग की परंपरा अपनाने वाले श्रद्धालु पूरे नवरात्र में उसी नियम का पालन करते हैं।
आडंबर से अधिक श्रद्धा और लोककल्याण को दें महत्व
पंडित लोकेश कुमार ने कहा कि मां दुर्गा की पूजा केवल व्यक्तिगत सुख-समृद्धि के लिए ही नहीं, बल्कि समाज और संसार के कल्याण की भावना से भी की जानी चाहिए। श्रद्धालुओं को सच्ची श्रद्धा और भक्ति के साथ माता की आराधना करते हुए सभी के सुख, शांति और मंगल की कामना करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि पूजा के दौरान बाहरी आडंबर के बजाय आस्था, संयम, अनुशासन और लोककल्याण की भावना को प्राथमिकता देना ही नवरात्र की आध्यात्मिक भावना है।
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