अवैध खनन से अस्तित्व खो रहे पर्वत, पर्यावरण संरक्षण के दावों पर उठे सवाल
कठूमर। विश्व पर्यावरण दिवस पर जहां पर्यावरण संरक्षण को लेकर बड़े-बड़े दावे और संकल्प लिए जा रहे हैं, वहीं कठूमर क्षेत्र के पहाड़ इन दावों की हकीकत बयां कर रहे हैं। घाटा भावर, भनोखर, नांगल सहाड़ी और दांतिया क्षेत्र के पर्वत लंबे समय से अवैध खनन की मार झेल रहे हैं। लगातार हो रहे खनन से इन पहाड़ों का स्वरूप बदलता जा रहा है और उनका अस्तित्व संकट में पड़ता दिखाई दे रहा है।
क्षेत्रवासियों का आरोप है कि भनोखर स्थित भौमिया पहाड़ का वर्षों से लगातार दोहन किया जा रहा है। मुख्य स्टैंड के पीछे स्थित पहाड़ी क्षेत्र में खनन गतिविधियों के कारण प्राकृतिक संरचना को गंभीर नुकसान पहुंचा है। ग्रामीणों का कहना है कि उपतहसील कार्यालय होने के बावजूद अवैध खनन पर प्रभावी अंकुश नहीं लग पाया है।
खाइयां भी नहीं रोक पाईं खनन माफिया
ग्रामीणों के अनुसार प्रशासन ने अवैध खनन रोकने के उद्देश्य से पहाड़ी क्षेत्रों के चारों ओर खाइयां खुदवाई थीं, लेकिन खनन माफिया ने कई स्थानों पर इन खाइयों को पाटकर दोबारा रास्ते बना लिए। इसके बाद अवैध खनन का सिलसिला फिर शुरू हो गया।
नांगल सहाड़ी क्षेत्र में भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। ग्रामीणों का कहना है कि पुलिस थाना कुछ किलोमीटर की दूरी पर होने के बावजूद अवैध खनन सामग्री से भरे वाहन बेखौफ होकर आवाजाही कर रहे हैं। तेज रफ्तार वाहनों से सड़क दुर्घटनाओं का खतरा भी बढ़ गया है, जिससे स्थानीय लोगों में नाराजगी है।
पर्यावरण और जल स्रोतों पर बढ़ता खतरा
स्थानीय लोगों का मानना है कि कभी पहाड़ों और हरियाली से समृद्ध यह क्षेत्र बेहतर वर्षा, स्वच्छ वातावरण और जैव विविधता के लिए जाना जाता था। लेकिन लगातार हो रहे अवैध खनन के कारण तापमान में वृद्धि, वर्षा के पैटर्न में बदलाव और भूजल स्तर में गिरावट जैसी समस्याएं बढ़ती जा रही हैं।
विशेषज्ञ भी मानते हैं कि पहाड़ों का क्षरण पर्यावरणीय संतुलन को प्रभावित करता है। इससे जल संरक्षण, वनस्पति और वन्यजीवों पर प्रतिकूल असर पड़ता है। यही कारण है कि सरकार को हर वर्ष जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण और पौधारोपण अभियानों पर करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ते हैं।
ग्रामीणों ने की सख्त कार्रवाई की मांग
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर क्षेत्र के ग्रामीणों ने प्रशासन से अवैध खनन के खिलाफ प्रभावी और स्थायी कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते खनन गतिविधियों पर रोक नहीं लगी तो आने वाली पीढ़ियों को प्राकृतिक धरोहरों से वंचित होना पड़ेगा।
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