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    भारत जन्म को बताया पुण्योदय का फल, आचार्य रामदयालजी महाराज ने अज्ञान को बताया दुःख का कारण

    चातुर्मास सत्संग में आचार्य रामदयालजी महाराज का संदेश, सद्गुरु की कृपा और ज्ञान से जीवन होता है धन्य

    भीलवाड़ा। माणिक्यनगर रामद्वारा धाम में आयोजित ‘विश्व शांति कल्याण’ चातुर्मास के दैनिक सत्संग में अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय शाहपुरा के पीठाधीश्वर जगद्गुरु आचार्य स्वामी रामदयालजी महाराज ने कहा कि कई जन्मों के पुण्योदय के बाद भारत की धरती पर जन्म प्राप्त होता है। उन्होंने कहा कि अनंत जन्मों के भाग्योदय से ही रामस्नेही सम्प्रदाय की छत्रछाया और सद्गुरु की कृपा प्राप्त होती है।

    सद्गुरु का प्रेम देता है मजबूती

    आचार्य रामदयालजी महाराज ने कहा कि संसार का प्रेम और मोह व्यक्ति को कमजोर बनाता है, जबकि सद्गुरु का प्रेम और स्नेह जीवन को मजबूत करता है। उन्होंने कहा कि राम गुरु के बंधन में बंधकर ज्ञानी चौरासी लाख योनियों के बंधन से मुक्त होने का मार्ग प्राप्त करता है। सद्गुरु की कृपा और भजन से ही जीवन धन्य बनता है।

    अज्ञान को बताया मानसिक पीड़ा का मूल कारण

    प्रवचन के दौरान आचार्यश्री ने कहा कि व्यक्ति के जीवन में मानसिक संताप और अधिकांश दुःखों का सबसे बड़ा कारण अज्ञान है। उन्होंने कहा कि घर, परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व में विवाद, विरोध तथा विद्रोह के तीन प्रमुख कारण अज्ञानवाद, अर्थवाद और अहंकारवाद हैं।

    उन्होंने कहा कि जो व्यवहार व्यक्ति अपने लिए पसंद नहीं करता, वही व्यवहार दूसरों के साथ भी नहीं करना चाहिए। अज्ञान के कारण व्यक्ति स्वयं अच्छे व्यवहार की अपेक्षा करता है, लेकिन दूसरों के साथ दुर्व्यवहार करता है। उन्होंने कहा कि दुनिया में शारीरिक रूप से दुखी लोगों से अधिक मानसिक रूप से पीड़ित लोग हैं।

    वेद, शास्त्र और गुरु के सम्मान का दिया संदेश

    आचार्य रामदयालजी महाराज ने कहा कि वेद, शास्त्र, पुराण और अनुभव वाणी में वर्णित सिद्धांतों का सम्मान होना चाहिए। उन्होंने कहा कि गुरु, धर्म और संस्कृति का सम्मान समाज को सही दिशा देता है तथा मिथ्या ज्ञान और अनावश्यक वाद-विवाद से बचना चाहिए।

    भीलवाड़ा को बताया अनुभव वाणी की प्राकट्य भूमि

    आचार्यश्री ने भीलवाड़ा की पावन धरा को नमन करते हुए कहा कि इसी भूमि पर स्वामी रामचरण महाराज ने विक्रम संवत 1817 में अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय की स्थापना की और अनुभव वाणी जैसे महान ग्रंथ की रचना की। उन्होंने कहा कि भीलवाड़ा संतों की अनुभूति और आध्यात्मिक परंपरा की महत्वपूर्ण भूमि है।

    सत्संग से पूर्व संत मनोरथरामजी आलोट ने मानस प्रवचन किया, जबकि कोटा से पधारे संत प्रीतमरामजी ने भजन प्रस्तुत किए। प्रवचन के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री की आरती की। कार्यक्रम में भीलवाड़ा सहित विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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