किसी भी रूप में जब भरोसा टूटता है तो बिखर जाता है पारिवारिक और सामाजिक तानाबाना
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बात मन की : निलेश कांठेड़
यह संतान के प्रति भविष्य में सेवा और सहारे का भरोसा ही तो होता है, जिसके कारण माता-पिता अपनी सारी जमा-पूंजी बच्चों का भविष्य उज्ज्वल बनाने में लगा देते हैं। युवा का परीक्षा कराने वाली एजेंसी पर भरोसा ही उसे दिन-रात मेहनत करने के लिए प्रेरित करता है। भरोसा ही वह आधार है, जिसके सहारे माता-पिता बड़े नाजों से पाली अपनी बेटी का हाथ किसी अजनबी को जीवनभर के लिए थमा देते हैं। इसी भरोसे के साथ माता-पिता अपने जिगर के टुकड़े बेटे को बहू के रूप में पराए घर से आई किसी अजनबी लड़की के हाथ सौंप देते हैं।
एक गंभीर बीमार परिजन को जिंदगी बचाने के लिए डॉक्टर के हवाले करना भी भरोसा है। दोस्तों पर विश्वास होने के कारण ही अभिभावक अपनी संतान को उनके साथ घूमने भेजते हैं। व्यवसायी का कर्मचारी पर भरोसा होता है, तभी वह उसे लाखों-करोड़ों रुपये देकर कहीं भी भेज देता है। बाहर जाते समय घर की चाबी पड़ोसी को सौंपना भी भरोसे का प्रतीक है। व्यापारी द्वारा सामान उधार देना और ग्राहक द्वारा एडवांस भुगतान करना भी एक-दूसरे के प्रति विश्वास का ही प्रमाण है। सरकार हमारी मेहनत की कमाई से जमा किए गए टैक्स का जनहित और राष्ट्रहित में उपयोग करेगी, इसी भरोसे लोग ईमानदारी से अरबों-खरबों रुपये कर के रूप में जमा कराते हैं। ‘‘जब सब साथ छोड़ देंगे तो परमात्मा साथ देंगे’’—इसी विश्वास के सहारे इंसान ईश्वर की भक्ति में अपना जीवन समर्पित कर देता है। सच तो यह है कि इन तमाम तरह के भरोसों के सहारे ही हमारी जिंदगी की नाव आगे बढ़ती है।
लेकिन यही भरोसा तब टूटता है, जब सोनीपत में जीवन का अंतिम समय वृद्धाश्रम में बिताने वाले व्यवसायी शिवचरण गुप्ता की मृत्यु पर उनके अंतिम संस्कार के लिए तीन संतानों में से एक भी नहीं पहुंचता और रुपये भेजकर या वीडियो कॉल पर अंतिम दर्शन कर अपने दायित्व की इतिश्री समझ ली जाती है। युवाओं का व्यवस्था पर भरोसा उस समय चकनाचूर हो जाता है, जब पता चलता है कि जिस परीक्षा में चयन के लिए वे खून-पसीना एक कर रहे हैं, उसी परीक्षा को संचालित करने वाली एजेंसी के अधिकारी या कर्मचारी पेपर लीक कर लाखों-करोड़ों रुपये कमा रहे हैं।
भरोसा तब भी तार-तार हो जाता है, जब सिया नाम की मंगेतर अपने प्रेमी चेतन के साथ मिलकर भावी जीवनसाथी केतन को पहाड़ से नीचे धकेल देती है। जब हनीमून मनाने गई सोनम अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति राजा रघुवंशी की हत्या कर देती है, तब भी सवाल सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या का नहीं होता, बल्कि उस विश्वास की हत्या का होता है, जिस पर एक वैवाहिक रिश्ता खड़ा था।
भरोसा उस समय भी टूटता है, जब ऑनलाइन गेम में हुए नुकसान की भरपाई के लिए भीलवाड़ा में एक पत्नी ही पति के 12 लाख रुपये चुराकर उसे चोरी का रूप देने का प्रयास करती है। फल विक्रेता के कर्मचारी द्वारा 20 लाख रुपये गायब कर उसे लूट का रूप देने की कोशिश हो, नवविवाहिता की दहेज के लिए हत्या हो, छात्रावास या पीजी में मानसिक तनाव से परेशान किसी छात्र की आत्महत्या हो या पेपर लीक से आहत किसी युवा का जिंदगी से हार जाना—हर ऐसी घटना किसी न किसी भरोसे को चोट पहुंचाती है।
जब मंदिर में भगवान के प्रति असीम आस्था के कारण अर्पित किए गए चंदे की राशि में गड़बड़ी होती है, जब चिकित्सकीय लापरवाही से कोई मरीज दम तोड़ देता है, जब कोई जनप्रतिनिधि या अधिकारी घपले-घोटाले में दोषी साबित होता है, जब कर्मचारी अमानत में खयानत या गबन करता है अथवा व्यापारी एडवांस भुगतान लेने के बाद घटिया सामान थमा देता है, तब केवल आर्थिक या कानूनी अपराध नहीं होता, बल्कि भरोसे का भी ‘‘कत्ल’’ होता है।
भरोसे की हत्या होने पर हमारी जिंदगी की नाव डगमगाने लगती है। कई बार झटका इतना जोरदार होता है कि परमात्मा के प्रति हमारी आस्था भी डांवाडोल होने लगती है और विश्वास की पूरी नाव ही डूबने लगती है। जब ऐसा होना सामान्य या रोजमर्रा की बात बन जाए तो विश्वास, भरोसा और आस्था जैसे शब्द इंसानी शब्दकोश से धीरे-धीरे गायब होने लगते हैं और उनकी जगह बेवफाई, मर्डर, बेईमानी, भ्रष्टाचार, गबन और घोटाले जैसे शब्द हमारी जुबान पर आने लगते हैं।
व्यवस्था से भरोसा उठता है तो युवा किसी नए राजनीतिक या सामाजिक मोर्चे को वर्षों पुराने राजनीतिक दलों से ज्यादा भरोसेमंद मानने लगते हैं। आज स्थिति यह है कि प्रतियोगी परीक्षा देने वाले युवा और उनके अभिभावक परिणाम आने से पहले ही आशंकित हो जाते हैं कि कहीं इसमें धांधली तो नहीं हुई। जीवनसाथी के चयन के प्रस्तावों पर भी लोग आसानी से निर्णय नहीं ले पा रहे हैं। मन में संशय घर कर गया है कि सामने वाला कहीं कोई महत्वपूर्ण बात छिपा तो नहीं रहा।
कोचिंग के लिए दूसरे शहरों में गए प्रतिभावान बच्चों के हॉस्टल या पीजी में आत्महत्या की बढ़ती घटनाएं अभिभावकों का कोचिंग संचालकों, वार्डन और पूरी व्यवस्था पर भरोसा कमजोर कर रही हैं। जब जीवनसाथी या दोस्त ही कातिल बन जाएं तो रिश्तों के सबसे मजबूत आधार पर भी सवाल खड़े होना स्वाभाविक है।
किसी रिश्ते, संस्था या व्यवस्था में भरोसा हासिल करने में पूरी जिंदगी लग सकती है, लेकिन एक घटना उस भरोसे का ‘‘कत्ल’’ करने के लिए काफी होती है। यही कारण है कि भरोसा केवल दो व्यक्तियों के बीच का भाव नहीं है, बल्कि परिवार, समाज और राष्ट्र को जोड़कर रखने वाली अदृश्य डोर है।
शासन व्यवस्था में शासक भ्रष्ट और नाकारा हो जाए तो कई बार हालात ऐसे बन जाते हैं कि लोगों का पूरी व्यवस्था से ही भरोसा उठने लगता है। और जब जनता का व्यवस्था से विश्वास खत्म होने लगे तो लोकतंत्र की जड़ें भी कमजोर होने लगती हैं। परिवार हो, समाज हो या प्रशासनिक व्यवस्था—भरोसा कायम हुए बिना कोई रिश्ता या सिस्टम लंबे समय तक मजबूत नहीं रह सकता।
इसलिए जीवनसाथी के चयन का मामला हो या कोई दूसरा रिश्ता, कोई बात मनमाफिक नहीं लगे तो खूब खरी-खोटी सुना दीजिए, असहमति जताइए, जरूरत हो तो रिश्ता या काम भी छोड़ दीजिए, लेकिन पीठ में खंजर घोंपते हुए विश्वासघात मत कीजिए। किसी के भरोसे का फायदा मत उठाइए।
क्योंकि याद रखिए भरोसा एक व्यक्ति तोड़ता है, लेकिन उसका असर कई लोगों के विश्वास पर पड़ता है। एक व्यक्ति का विश्वासघात कभी-कभी इंसान का विश्वास पूरी दुनिया से उठा देता है। जब विश्वास और भरोसे का रिश्ता दरकता है तो परिवार बिखरता है, समाज टूटता है और व्यवस्था कमजोर होती है। यदि हम अपने और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुनहरे भविष्य की चाहत रखते हैं तो विश्वास और भरोसे की डोर को अटूट और अकाट्य बनाना ही होगा।
क्योंकि जिंदगी बहुत कुछ बिना भरोसे के चल सकती है, लेकिन रिश्ते, परिवार, समाज और राष्ट्र—भरोसे के बिना नहीं चल सकते। यही जिंदगी का अटल सत्य है।
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