धार्मिक आयोजन में श्रद्धालुओं ने रखा रोटतीज व्रत, तीर्थंकरों की पूजा-अर्चना के साथ संयम और आत्मशुद्धि का लिया संकल्प
लक्ष्मणगढ़। जैन समाज के श्रद्धालुओं ने भाद्रपद शुक्ल तृतीया के अवसर पर रोटतीज पर्व पूर्ण श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ मनाया। कस्बे में सुबह से ही जैन धर्मावलंबियों में पर्व को लेकर उत्साह दिखाई दिया। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने व्रत रखा और जैन मंदिर पहुंचकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की।
रोटतीज जैन धर्म का महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। यह पर्व केवल व्रत और पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि आत्मचिंतन, संयम और आध्यात्मिक साधना का संदेश भी देता है। श्रद्धालुओं ने इस अवसर पर नकारात्मक विचारों और अनुचित आचरण का त्याग करने का संकल्प लिया।
सुबह व्रत का संकल्प, मंदिर में हुई चौबीसी पूजा
कस्बे में व्रत रखने वाले जैन धर्मावलंबी सुबह जल्दी उठे और स्नान आदि के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर व्रत का संकल्प लिया। अधिकांश जैन परिवारों में व्रत रखा गया। कई घरों में महिलाओं के साथ पुरुषों ने भी व्रत किया।
इसके बाद श्रद्धालु जैन मंदिर पहुंचे, जहां 24 तीर्थंकरों की पूजा की गई। इस पूजा को चौबीसी विधान कहा जाता है। पुरुष श्रद्धालुओं ने भगवान की प्रतिमाओं का अभिषेक किया। इसके बाद विधि-विधान से पूजा-अर्चना और व्रत कथा का पाठ किया गया।
रोट, खीर, दही और तुरई की सब्जी का किया विधान
व्रत के दौरान विशेष रूप से रोट, खीर, दही और तुरई की सब्जी बनाई गई। पूजन के बाद तैयार किए गए भोग को गाय को खिलाया गया।
पर्व के दौरान श्रद्धालुओं ने धार्मिक साधना के साथ आत्मसंयम और सकारात्मक आचरण पर भी जोर दिया। उनका मानना है कि रोटतीज का उद्देश्य मन को एकाग्र करना, आत्मशांति प्राप्त करना और मोक्ष के मार्ग की ओर आगे बढ़ना है।
तीन, 12 या 24 वर्षों तक रखा जा सकता है व्रत
जैन परंपरा के अनुसार रोटतीज का व्रत 3, 12 या 24 वर्षों तक रखा जा सकता है। इस दिन एकासन का विधान होता है, जिसमें दिन में एक बार एक ही अन्न से बना भोजन ग्रहण किया जाता है।
पर्व के दौरान दान का भी विशेष महत्व बताया गया है। श्रद्धालुओं ने धर्म के साथ सेवा और परोपकार की भावना को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया।
संयम और आत्मशांति का संदेश
धर्मावलंबियों ने कहा कि रोटतीज का पर्व व्यक्ति को भौतिक सुख-सुविधाओं से ऊपर उठकर संयम और आत्मशुद्धि की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है। व्रत करने वाले साधकों ने धर्म-ध्यान में लीन रहने के साथ नकारात्मक विचारों और गलत आचरण का त्याग करने का संकल्प लिया।
जैन मुनियों के संदेश के अनुसार, पर्व की सार्थकता तभी है जब थाली में रोट के साथ हृदय में श्रद्धा, वाणी में जिनवाणी और जीवन में संयम हो। इसी भावना के साथ जैन समाज ने रोटतीज पर्व मनाकर आत्मकल्याण और धर्माचरण का संदेश दिया।
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