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    शाश्वत तीर्थ अयोध्या में तीस चौबीसी जिनमंदिर पर कलशारोहण, ज्ञानमती माताजी का मनाया संयम महोत्सव

    शरदपूर्णिमा महोत्सव में 93वें जन्मोत्सव पर उमड़े श्रद्धालु, गणिनी ज्ञानमती माताजी ने कहा—पूजन हमारा नहीं, संयम और तप का सम्मान है

    अयोध्या/जयपुर। शाश्वत जैन तीर्थ अयोध्या के रायगंज स्थित दिगंबर जैन मंदिर, बड़ी मूर्ति में त्रिदिवसीय शरदपूर्णिमा महोत्सव के दौरान गणिनीप्रमुख आर्यिका शिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी का 93वां जन्मोत्सव एवं 75वां संयम दिवस विविध धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों के साथ श्रद्धापूर्वक मनाया गया। 26 अक्टूबर को आयोजित मुख्य समारोह में भगवान ऋषभदेव के अभिषेक, तीस चौबीसी जिनमंदिर के शिखर पर कलशारोहण एवं ध्वजारोहण, ज्ञानाराधना पूजन, सम्मान समारोह और भक्ति प्रस्तुतियां आकर्षण का केंद्र रहीं। आयोजन में देश के लगभग 22 प्रांतों से हजारों श्रद्धालु शामिल हुए।

    तीस चौबीसी जिनमंदिर के शिखर पर हुआ कलशारोहण

    महोत्सव के अवसर पर प्रातःकाल रायगंज स्थित बड़ी मूर्ति में भगवान ऋषभदेव का पंचामृत अभिषेक किया गया। इसके बाद परिसर में स्थित तीस चौबीसी जिनालय के शिखर पर कलशारोहण और ध्वजारोहण का धार्मिक आयोजन हुआ। मध्य शिखर पर कलशारोहण कुलाधिपति सुरेश जैन, मुरादाबाद की ओर से, जबकि दाईं ओर के शिखर पर जिनराज जैन, दिल्ली और बाईं ओर के शिखर पर गजराज जैन, दिल्ली की ओर से कराया गया।

    श्रद्धालु कलशों को बग्गी में विराजमान कर परिसर में लेकर पहुंचे। इसके बाद विधि-विधान और भक्तिमय वातावरण में मंदिर के शिखरों पर कलशारोहण एवं ध्वजारोहण संपन्न हुआ।

    अयोध्या तीर्थक्षेत्र कमेटी के मंत्री विजय कुमार जैन के अनुसार, मुख्य सभा की अध्यक्षता तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद के कुलाधिपति सुरेशचंद जैन ने की। तीर्थक्षेत्र कमेटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जम्बू प्रसाद जैन, गाजियाबाद मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। संपूर्ण आयोजन पीठाधीश स्वस्ति श्री रवींद्रकीर्ति स्वामी के नेतृत्व में संपन्न हुआ।

    108 जोड़ों ने की सरस्वती और महालक्ष्मी की अर्चना

    मुख्य धार्मिक कार्यक्रम में परम पूज्य प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी के सानिध्य में 108 जोड़ों ने सरस्वती एवं महालक्ष्मी की अर्चना-पूजा की। इस आयोजन में अमित पहाड़े, हैदराबाद और मीना-सज्जन कुमार जैन, खार मुंबई प्रमुख पात्र रहे।

    इसके बाद 75 मंत्रों के माध्यम से गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की ज्ञानाराधना की गई। तत्पश्चात उनके 93वें जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में 93 अर्घ्यों से समन्वित पूजन संपन्न हुआ। इस पूजन का सौभाग्य नितिन नखाते, नागपुर, सुभाषिनी जैन, प्रतीक जैन, बनारस, अनिल जैन संघपति, दिल्ली और विजय जैन, राजपुर रोड, दिल्ली को प्राप्त हुआ।

    इस अवसर पर माताजी ने अपने आशीर्वचन में कहा, यह पूजन हमारी नहीं, संयम और त्याग की पूजा है। त्याग से ही व्यक्ति महान बनता है और उसके गुणों की पूजा की जाती है।

    उन्होंने अपने संयम मार्ग की यात्रा का स्मरण करते हुए बताया कि 74 वर्ष पूर्व उन्होंने गृहत्याग किया था। उस समय कुंवारी कन्या का घर से निकलना सहज नहीं माना जाता था, लेकिन त्याग और वैराग्य की भावना के साथ उन्हें अपनी माता से संबल मिला और उन्होंने संयम के मार्ग पर चलने का निर्णय लिया।

    आर्यिका रत्नमती नारी सम्मान सहित कई पुरस्कार प्रदान

    माताजी के जन्मोत्सव के अवसर पर समाजसेवा और विभिन्न क्षेत्रों में योगदान देने वाली महिलाओं को आर्यिका श्री रत्नमती नारी सम्मान से सम्मानित किया गया। सम्मान प्राप्त करने वालों में कुसुमलता जैन, दिल्ली, अनीता जैन, दिल्ली, सुषमा जैन, टिकैतनगर, सुनीता कासलीवाल, संभाजीनगर और अर्चना जैन, डालीगंज, लखनऊ शामिल रहीं।

    जम्बूद्वीप पुरस्कार हरियाणा के फर्रुखनगर निवासी गजेन्द्र जैन को प्रदान किया गया। अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री उदयभान जैन के अनुसार, सामाजिक सेवाओं के लिए लाला छोटेलाल जैन स्मृति पुरस्कार डॉ. चंद्रकांत नेमिनाथ चौगुले, सांगली को दिया गया।

    आर्यिका श्री रत्नमती पुरस्कार अनोपबाई पुखराज पाण्ड्या, गोरखपुर को मिला। वहीं संस्थान का सर्वोच्च सम्मान गणिनी ज्ञानमती पुरस्कार प्रयागराज की श्रीमती आरती प्रकाशचंद जैन ‘शीशे वाले’ को प्रदान किया गया।

    तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद की बालिकाओं और टिकैतनगर बालिका मंडल ने भक्ति नृत्य प्रस्तुत किए। कार्यक्रम का मंगलाचरण सुभाषचंद जैन सर्राफ, लखनऊ ने किया। संचालन डॉ. जीवन प्रकाश जैन और विजय कुमार जैन ने किया।

    संयम दिवस पर पिच्छी, कमंडलु और शास्त्र भेंट

    संयम दिवस के अवसर पर गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी को संयम के उपकरण पिच्छी भेंट करने का सौभाग्य अर्चना जयचंद कासलीवाल और भूषण कासलीवाल, चांदवड़ को प्राप्त हुआ। कमंडलु कैलाशचंद, आदीश कुमार, अमृत और आगम जैन परिवार, लखनऊ की ओर से भेंट किया गया। शास्त्र भेंट करने का सौभाग्य जयकुमार और अशोक कुमार जैन, टिकैतनगर को मिला।

    मुख्य पादप्रक्षालन अशोक जैन, चांदवड़-जयपुर ने किया। माताजी के जन्मोत्सव पर 93 विद्युत दीप प्रज्ज्वलित किए गए, जिनमें अतुल जैन, राकेश जैन, विनोद जैन और राजकुमार जैन, दिल्ली सहित महाराष्ट्र के गणिनी ज्ञानमती भक्तमंडल के श्रद्धालुओं ने सहभागिता की।

    भरूच से पधारे भट्टारक श्री अरिहंतकीर्ति स्वामी ने समस्त भट्टारक परिषद की ओर से माताजी को ‘महायोगिनी’ की उपाधि प्रदान करते हुए प्रशस्ति भेंट की। कार्यक्रम का ध्वजारोहण संजय रेखा दीवान, सूरत ने किया। इस अवसर पर विभिन्न प्रांतों से आई महिलाओं को संयम दिवस की स्मृति में साड़ी भेंट की गई।

    1008 दीपकों से हुई मंगल आरती, जन्म समय पर मनाई खुशियां

    सायंकाल गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की मंगल आरती 1008 दीपकों से की गई। भजन गायक रूपेश जैन ने भक्ति गीतों की प्रस्तुतियां दीं। रात्रि 9:15 बजे माताजी के जन्म समय पर विभिन्न प्रांतों से आए श्रद्धालुओं ने थाली बजाकर जन्मोत्सव की खुशियां मनाईं। प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी ने उपस्थित भक्तों को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।

    कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने पूरे तीर्थ परिसर को भक्तिमय बना दिया। समारोह के दौरान त्याग, तप, संयम और आध्यात्मिक साधना के संदेश पर विशेष जोर दिया गया।

    भगवान ऋषभदेव की भव्य रथयात्रा के साथ महोत्सव का समापन

    महोत्सव के समापन अवसर पर 27 अक्टूबर को सुबह छह बजे से अभिषेक, भगवान ऋषभदेव की विशाल प्रतिमा का महामस्तकाभिषेक और पूजन सहित विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित हुए। इस दौरान लखनऊ, दिल्ली, रायपुर, अहमदाबाद, इंदौर, सूरत, मुंबई और अन्य स्थानों से आए अतिथियों एवं समाज के प्रतिनिधियों का स्वागत-अभिनंदन किया गया।

    इसके बाद भगवान श्रीजी की भव्य रथयात्रा अयोध्या रायगंज जैन मंदिर से प्रारंभ होकर तपसी छावनी होते हुए वापस मंदिर परिसर पहुंची। शाम को श्रद्धालुओं ने गुरुमां की महाआरती की और देर रात तक शाश्वत तीर्थ क्षेत्र में भक्ति-आराधना का क्रम जारी रहा।

    पीठाधीश स्वस्ति श्री रवींद्रकीर्ति स्वामी ने आशीर्वचन देते हुए सभी श्रद्धालुओं, अतिथियों और आयोजन से जुड़े लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया। तीन दिवसीय महोत्सव ने जैन समाज में संयम, त्याग, ज्ञानाराधना और धार्मिक परंपराओं के प्रति श्रद्धा का संदेश दिया।

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