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    25 जुलाई से शुरू होगा चतुर्मास, आत्मशुद्धि और संयम का पावन काल

    भक्ति, चतुर्मास में पूजा-पाठ, दान और आत्मसंयम का विशेष महत्व; मांगलिक कार्यों पर रहेगा विराम

    लक्ष्मणगढ़। हिंदू धर्म में चतुर्मास का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। यह चार माह की अवधि भगवान विष्णु की आराधना, व्रत, तप, दान और आत्मसंयम के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, चतुर्मास के दौरान भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और देवउठनी एकादशी के दिन जागृत होते हैं। इस अवधि में श्रद्धालु भक्ति, साधना और सदाचार का पालन करते हुए अपनी इच्छाओं एवं आदतों पर नियंत्रण रखने का संकल्प लेते हैं।

    पंडित लोकेश कुमार ने बताया कि हिंदू पंचांग के अनुसार चतुर्मास की शुरुआत आषाढ़ शुक्ल एकादशी, अर्थात देवशयनी एकादशी से होती है। वर्ष 2026 में देवशयनी एकादशी 25 जुलाई को है और इसी दिन से चतुर्मास प्रारंभ होगा। यह अवधि देवउठनी एकादशी तक चलेगी, जिसमें सावन, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक मास शामिल रहते हैं।

    उन्होंने बताया कि धार्मिक दृष्टि से यह समय पूजा-पाठ, दान-पुण्य, आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक साधना के लिए सर्वोत्तम माना गया है। श्रद्धालुओं को इस दौरान भगवान विष्णु की आराधना, विष्णु सहस्रनाम, श्रीमद्भगवद्गीता एवं अन्य धार्मिक ग्रंथों का पाठ करना चाहिए। साथ ही जरूरतमंदों की सेवा, दान, व्रत, संयम तथा सात्विक जीवन शैली अपनाने का विशेष महत्व बताया गया है।

    चतुर्मास में इन कार्यों का रखें विशेष ध्यान

    • भगवान विष्णु की नियमित पूजा एवं मंत्र जाप करें।
    • विष्णु सहस्रनाम, श्रीमद्भगवद्गीता सहित धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करें।
    • दान-पुण्य एवं सेवा कार्यों में भाग लें।
    • सात्विक भोजन एवं संयमित जीवनशैली अपनाएं।
    • प्रतिदिन प्रातःकाल पूजा-अर्चना करें।

    इन कार्यों से बचने की परंपरा

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चतुर्मास में विवाह, गृह प्रवेश एवं अन्य मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। इसके अतिरिक्त मांसाहार, तामसिक भोजन, क्रोध, असत्य, नकारात्मक विचार तथा अनावश्यक भौतिक सुख-सुविधाओं में अधिक लिप्त रहने से बचने की सलाह दी जाती है।

    त्याग का विशेष महत्व

    पंडित लोकेश कुमार ने बताया कि चतुर्मास में किसी प्रिय वस्तु अथवा आदत का त्याग करना शुभ माना जाता है। अनेक श्रद्धालु इस अवधि में दूध, दही, तेल, मिठाई, नमक अथवा किसी विशेष खाद्य पदार्थ का त्याग करते हैं। इससे मन पर नियंत्रण बढ़ता है और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। हालांकि, त्याग अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर ही करना चाहिए।

    उद्यापन की परंपरा

    चतुर्मास पूर्ण होने पर देवउठनी एकादशी के अवसर पर उद्यापन किया जाता है। इस दौरान भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी की पूजा-अर्चना कर फल, मिठाई और सात्विक भोजन का भोग लगाया जाता है। श्रद्धानुसार ब्राह्मणों अथवा जरूरतमंदों को भोजन कराया जाता है तथा दान-पुण्य किया जाता है। जिस वस्तु का त्याग किया गया हो, उसे पुनः ग्रहण करने से पहले भगवान का स्मरण करने की परंपरा है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चतुर्मास आत्मशुद्धि, संयम, सेवा और भक्ति का श्रेष्ठ काल है। इस अवधि में किए गए सत्कर्म, पूजा-पाठ और सेवा कार्य व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं।

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