तेहरान/वाशिंगटन। लगभग चार दशकों के कड़े अमेरिकी प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय अलगाव के बाद, ईरान के लिए एक बहुत बड़े आर्थिक कायाकल्प (आर्थिक मोड़) का रास्ता साफ होता नजर आ रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच स्विट्जरलैंड में चल रही कूटनीतिक वार्ताओं के बीच अब 300 अरब डॉलर ($300 Billion) के एक विशालकाय प्रस्तावित 'विकास और निवेश फंड' की चर्चा दुनिया भर के बाजारों में जोर पकड़ रही है। यह भारी-भरकम राशि दुनिया के कई छोटे देशों की कुल जीडीपी (अर्थव्यवस्था) से भी कहीं बड़ी है, जो ईरान के भविष्य को पूरी तरह बदल सकती है।
यह सीधा मुआवजा नहीं, बल्कि 'इन्वेस्टमेंट मॉडल' है
इस ऐतिहासिक सौदे के पीछे के नियम और कूटनीति बेहद जटिल हैं। अमेरिकी प्रशासन ने पहले ही पूरी दुनिया के सामने यह साफ कर दिया है कि यह राशि ईरान को दिया जाने वाला कोई सीधा कैश पेमेंट (नकद भुगतान) या युद्ध का मुआवजा नहीं है। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, यह ईरान के नाम कोई 300 अरब डॉलर का चेक काटना नहीं है, बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय निवेश मंच (इन्वेस्टमेंट प्लेटफॉर्म) होगा।
इस मंच के जरिए अमेरिकी, खाड़ी देश और दुनिया भर की बड़ी कंपनियां व निजी कॉर्पोरेट निवेशक ईरान के अलग-अलग क्षेत्रों में अपना पैसा लगाएंगे। यह पूरा फंड सीधे ईरानी सरकार के खजाने या खाते में ट्रांसफर नहीं किया जाएगा, बल्कि सीधे विकास परियोजनाओं के निवेश के रूप में ईरान के भीतर आएगा।
दुनिया भर के निवेशकों से मिला बड़ा कमिटमेंट
इस प्रस्तावित फंड को लेकर वैश्विक बाजार में भारी उत्साह देखा जा रहा है। इसमें सिर्फ अमेरिकी कंपनियां ही नहीं, बल्कि निम्नलिखित क्षेत्रों के बड़े निवेशक भी गहरी रुचि दिखा रहे हैं:
खाड़ी देश (Gulf Countries): यूएई, कतर और अन्य तेल समृद्ध राष्ट्र।
एशियाई देश: दक्षिण कोरिया, जापान, सिंगापुर और मलेशिया।
अन्य महाद्वीप: अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के कई बड़े कॉर्पोरेट घराने।
ताजा अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, इस 300 अरब डॉलर के कुल प्रस्तावित फंड में से आधे से अधिक राशि (लगभग 150 अरब डॉलर से ज्यादा) के लिए निवेशकों से शुरुआती कमिटमेंट (लिखित सहमति) पहले ही मिल चुकी है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि यह कोई कागजी योजना नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर एक वास्तविक वैश्विक आर्थिक ढांचा तैयार करने की गंभीर कोशिश है।
400 अरब डॉलर के मुआवजे पर बना 'बीच का रास्ता'
हालिया सैन्य संघर्ष और जंग के दौरान ईरान के कई अत्यंत महत्वपूर्ण औद्योगिक और रणनीतिक ठिकानों—जैसे कच्चे तेल की रिफाइनरियों, कमर्शियल हवाई अड्डों और बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) को भारी नुकसान पहुंचा था। इसी तबाही की भरपाई के लिए तेहरान शुरुआत में अमेरिका से करीब 400 अरब डॉलर के सीधे मुआवजे (कंपनसेशन) की मांग पर अड़ा हुआ था।
चूंकि अमेरिका ईरान को सीधे युद्ध का हर्जाना देने के लिए किसी भी कीमत पर तैयार नहीं था, इसलिए दोनों देशों के राजनयिकों ने बीच का रास्ता निकालते हुए 'मुआवजे' के इस दावे को 'वैश्विक निवेश के मॉडल' में तब्दील कर दिया। भले ही वाशिंगटन इसे विकास फंड कह रहा हो, लेकिन ईरान के शीर्ष प्रशासनिक अधिकारी इसे अपनी रणनीतिक जीत और 'अप्रत्यक्ष मुआवजे' के तौर पर ही देख रहे हैं, क्योंकि इस पैसे का अंतिम इस्तेमाल जंग में तबाह हुए ढांचे को दोबारा खड़ा करने में ही किया जाएगा।
ईरान की दशकों पुरानी ऊर्जा तकनीक का होगा आधुनिकीकरण
इस विशालकाय फंड की मदद से ईरान अपनी दशकों पुरानी और प्रतिबंधों के कारण जर्जर हो चुकी ऊर्जा (तेल और गैस) तकनीकों को पूरी तरह आधुनिक और अत्याधुनिक बना सकेगा। इसके साथ ही देश के भीतर:
नए और हाई-स्पीड रेलवे नेटवर्क बिछाए जाएंगे।
अंतरराष्ट्रीय बंदरगाहों (सी-पोर्ट्स) और हवाई अड्डों का बड़े पैमाने पर विकास होगा।
युद्ध में पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और संचार व्यवस्था को बहाल किया जाएगा।
गौरतलब है कि ईरान के पास वर्तमान में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस भंडार और चौथा सबसे बड़ा कच्चा तेल भंडार मौजूद है। इस निवेश के बाद ईरान अपनी इस प्राकृतिक ऊर्जा क्षमता का दुनिया के बाजारों में पूरी ताकत से इस्तेमाल कर सकेगा।
फंसे हुए 24 अरब डॉलर भी होंगे रिहा
इस 300 अरब डॉलर के नए निवेश फंड से अलग ईरान के लिए एक और बड़ी राहत की खबर है। विभिन्न देशों के विदेशी बैंकों में प्रतिबंधों के कारण फंसे (फ्रीज) पड़े ईरान के करीब 24 अरब डॉलर के सरकारी फंड को भी चरणबद्ध तरीके से जारी करने पर दोनों पक्षों में पूर्ण सहमति बन गई है। इस समझौते के तहत, कुल राशि की आधी रकम (लगभग 12 अरब डॉलर) दोनों देशों के बीच होने वाली अंतिम कूटनीतिक बातचीत से पहले ही ईरान को वापस मिल सकती है।
परमाणु शर्तों के पालन पर टिकी है पूरी डील
हालांकि, इस पूरे समझौते में एक बहुत बड़ा पेंच (शर्त) भी शामिल है। 300 अरब डॉलर का यह फंड अभी सिर्फ एक प्रस्तावित ढांचा है और इसकी शुरुआत तुरंत नहीं होने वाली है। इस वैश्विक पूंजी बाजार तक पहुंच बनाने के लिए ईरान को समझौते की बेहद सख्त और कड़ी शर्तों का अक्षरसः पालन करना होगा, जिनमें शामिल हैं:
ईरान को अपने परमाणु कार्यक्रम (Nuclear Program) को पूरी तरह सीमित करना होगा।
देश में मौजूद संवर्धित यूरेनियम (Enriched Uranium) के स्टॉक को पूरी तरह नष्ट/खत्म करना होगा।
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के कड़े और अचानक होने वाले निरीक्षणों (इन्स्पेक्शंस) को बिना शर्त स्वीकार करना होगा।
यदि ईरान इनमें से किसी भी शर्त के पालन से पीछे हटता है, तो यह पूरी अरबों डॉलर की आर्थिक योजना तत्काल प्रभाव से खतरे में पड़ जाएगी और रद्द कर दी जाएगी।
शुक्रवार को होने वाले एमओयू (MoU) पर टिकी नजरें
पिछले चार दशकों के इतिहास में ईरान को वैश्विक वित्तीय और पूंजी बाजारों तक इतनी बड़ी और खुली पहुंच पहले कभी नहीं मिली है। यदि यह कूटनीतिक और आर्थिक योजना सफल रहती है, तो ईरान न केवल युद्ध की विभीषिका से हुए नुकसान से उबर जाएगा, बल्कि अपनी पूरी अर्थव्यवस्था को एक नई और ऐतिहासिक दिशा दे देगा। फिलहाल, दुनिया भर के कूटनीतिज्ञों और आर्थिक विश्लेषकों की निगाहें आगामी शुक्रवार पर टिकी हैं, जब अमेरिका और ईरान के शीर्ष अधिकारी इस ऐतिहासिक सहमति पत्र (MoU) पर आधिकारिक तौर पर हस्ताक्षर करने वाले हैं।


