हरियाली अमावस्या पर शिव आराधना, पितृ तर्पण, दान-पुण्य और पौधरोपण का विशेष महत्व
लक्ष्मणगढ़। वर्षा ऋतु में जब चारों ओर हरियाली छा जाती है और प्रकृति अपने पूरे सौंदर्य के साथ दिखाई देती है, उसी समय आने वाली हरियाली अमावस्या धार्मिक आस्था के साथ प्रकृति संरक्षण और पर्यावरण के प्रति कृतज्ञता का संदेश देती है। सावन मास की अमावस्या को हरियाली अमावस्या के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष हरियाली अमावस्या 12 अगस्त, बुधवार को मनाई जाएगी।
पंचांगकर्ता एवं योग शिक्षक पंडित लोकेश कुमार के अनुसार हरियाली अमावस्या केवल धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति में प्रकृति, पितरों और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी है। सावन भगवान शिव की आराधना का महीना माना जाता है। इसी माह आने वाली अमावस्या पर शिव पूजन, पितृ तर्पण, दान-पुण्य और वृक्षारोपण का विशेष महत्व बताया गया है।
प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का पर्व है हरियाली अमावस्या
हरियाली अमावस्या का नाम ही इस पर्व की विशेषता को दर्शाता है। सावन में वर्षा के कारण सूखी धरती पर हरियाली लौटती है। खेत-खलिहान, पेड़-पौधे और वनस्पतियां नई ऊर्जा के साथ विकसित होती हैं। ऐसे में सनातन परंपरा में प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए इस दिन को विशेष महत्व दिया गया है।
भारतीय संस्कृति में प्रकृति को केवल संसाधन नहीं माना गया, बल्कि उसे जीवनदायिनी शक्ति के रूप में सम्मान दिया गया है। यही कारण है कि हरियाली अमावस्या पर वृक्षों की पूजा और पौधरोपण की परंपरा रही है।
पंडित लोकेश कुमार के अनुसार इस दिन पौधरोपण करना विशेष पुण्यकारी माना जाता है। विभिन्न क्षेत्रों में पीपल, बरगद, नीम, आंवला और बेल सहित कई उपयोगी एवं धार्मिक महत्व वाले पौधे लगाने की परंपरा रही है। सावन में पर्याप्त वर्षा होने के कारण पौधों के पनपने के लिए भी यह समय अनुकूल माना जाता है।
अमावस्या पर पितृ तर्पण का भी महत्व
अमावस्या तिथि को पितरों के निमित्त किए जाने वाले कर्मों के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। हरियाली अमावस्या पर श्रद्धालु अपने पितरों का स्मरण करते हुए तर्पण, श्राद्ध अथवा अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार पितृ कर्म कर सकते हैं।
मान्यता के अनुसार पितरों के निमित्त श्रद्धा से किए गए तर्पण और दान से पितरों की शांति की कामना की जाती है। इस अवसर पर जरूरतमंदों को भोजन कराना, अन्न-वस्त्र का दान करना अथवा सामर्थ्य के अनुसार सेवा कार्य करना भी पुण्यकारी माना गया है।
सावन के कारण शिव आराधना का विशेष महत्व
हरियाली अमावस्या सावन मास में आती है, इसलिए इस दिन भगवान शिव की आराधना का महत्व भी बढ़ जाता है। पंडित लोकेश कुमार के अनुसार श्रद्धालु भगवान शिव का जलाभिषेक कर बेलपत्र और पुष्प अर्पित कर सकते हैं। शिव पूजन के साथ ध्यान और मंत्र जाप करने की भी परंपरा है।
सावन में शिव आराधना के माध्यम से श्रद्धालु मन की शांति, परिवार की सुख-समृद्धि और जीवन में सकारात्मकता की कामना करते हैं।
स्नान, सूर्य को अर्घ्य और दान की परंपरा
हरियाली अमावस्या के दिन प्रातःकाल स्नान करने के बाद सूर्य देव को अर्घ्य देकर दिन की शुरुआत करने की परंपरा है। इसके बाद श्रद्धालु भगवान शिव सहित अन्य देवी-देवताओं का पूजन करते हैं।
अपनी श्रद्धा और पारिवारिक परंपरा के अनुसार पितरों का तर्पण करने के बाद जरूरतमंद लोगों को अन्न, वस्त्र अथवा अन्य आवश्यक सामग्री का दान किया जा सकता है। इस प्रकार हरियाली अमावस्या धार्मिक आस्था के साथ प्रकृति संरक्षण, सेवा और सामाजिक उत्तरदायित्व का संदेश भी देती है।
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