More
    Homeराज्यनई दिल्लीआचार्य कुंदकुंद की कृति तिरुक्कुरल पहुंचा विश्व मंच पर

    आचार्य कुंदकुंद की कृति तिरुक्कुरल पहुंचा विश्व मंच पर

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन को भेंट किया प्राचीन तमिल ग्रंथ तिरुक्कुरल का रूसी संस्करण; जैन समाज में गौरव और प्रसन्नता

    राजेन्द्र जैन महावीर की रिपोर्ट

    नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स सम्मेलन के अवसर पर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन को प्राचीन तमिल ग्रंथ तिरुक्कुरल का रूसी अनुवाद भेंट किया। भारत की प्राचीन ज्ञान-परंपरा से जुड़े इस महान ग्रंथ का विश्व के प्रमुख राष्ट्राध्यक्ष को भेंट किया जाना भारतीय संस्कृति और साहित्य के वैश्विक सम्मान का महत्वपूर्ण अवसर है। इस घटना को लेकर जैन समाज में विशेष प्रसन्नता और गौरव की अनुभूति है।

    जैन परंपरा के अनुसार तिरुवल्लुवर ही आचार्य कुंदकुंद थे और तिरुक्कुरल की रचना आचार्य कुंदकुंद ने ही की थी। इसलिए प्रधानमंत्री द्वारा तिरुक्कुरल को विश्व के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचाना जैन समाज के लिए विशेष महत्व रखता है।

    लगभग दो हजार वर्ष प्राचीन माने जाने वाले तिरुक्कुरल में मानव कल्याण के अनेकों दोहे हैं। जीवन के नैतिक, सामाजिक और व्यावहारिक पक्षों को अत्यंत संक्षिप्त एवं प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने के कारण यह ग्रंथ तमिल साहित्य की अमूल्य धरोहर माना जाता है। तमिल परंपरा में इसे तमिल वेद के रूप में भी सम्मानित किया जाता है।

    तिरुक्कुरल का संदेश किसी एक समाज या संप्रदाय तक सीमित नहीं है। इसमें सत्य, अहिंसा, दया, संयम, तप, त्याग, परोपकार, शाकाहार, सदाचार और आत्मानुशासन जैसे अनेक जीवन-मूल्यों का प्रभावशाली प्रतिपादन मिलता है। यही कारण है कि यह ग्रंथ संपूर्ण मानवता के लिए उपयोगी जीवन-दर्शन प्रस्तुत करता है।

    तिरुवल्लुवर ही आचार्य कुंदकुंद

    जैन समाज में आचार्य कुंदकुंद का स्थान अत्यंत विशिष्ट और श्रद्धापूर्ण है। दिगंबर जैन परंपरा के महान आचार्य के रूप में उनका स्मरण प्रत्येक शुभ कार्य के मंगलाचरण में किया जाता है।

    मंगलं भगवान वीरो, मंगलं गौतमो गणि।
    मंगलं कुंदकुंदाद्यो, जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्।।

    जैन विद्वत् परंपरा में तिरुवल्लुवर की पहचान आचार्य कुंदकुंद के रूप में की गई है। तिरुक्कुरल में अहिंसा, जीवदया, संयम, तप, त्याग और सदाचार जैसे जिन जीवन-मूल्यों का प्रभावशाली प्रतिपादन हुआ है, वे जैन दर्शन की मूल भावना से गहरे जुड़े हुए हैं।

    भारतवर्षीय दिगंबर जैन तीर्थ संरक्षिणी महासभा वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष टी. के. वेद इन्दौर ने इस संदर्भ में बताया कि तिरुवल्लुवर और आचार्य कुंदकुंद की पहचान को लेकर जैन समाज में महत्वपूर्ण ऐतिहासिक एवं साहित्यिक संदर्भ उपलब्ध हैं। भारत सरकार ने वर्ष 1960 में तिरुवल्लुवर के सम्मान में डाक टिकट जारी किया था। जैन समाज में इस टिकट को तिरुवल्लुवर और आचार्य कुंदकुंद की पहचान से जुड़े महत्वपूर्ण संदर्भ के रूप में देखा जाता है।

    इसी प्रकार वर्ष 2010 में आयोजित विश्व शास्त्रीय तमिल सम्मेलन के लोगो में भी तिरुवल्लुवर की प्रतिमा को प्रमुख स्थान दिया जाकर आचार्य कुंद कुंद भी लिखा था। जैन समाज इस पूरे संदर्भ को आचार्य कुंदकुंद की महान ज्ञान-परंपरा से जोड़कर गौरव के साथ देखता है।

    प्रोफेसर डॉ. वीर सागर शास्त्री ने बताए महत्वपूर्ण संदर्भ

    लाल बहादुर शास्त्री संस्कृत विद्यापीठ विश्वविद्यालय, दिल्ली के प्रोफेसर डॉ. वीर सागर शास्त्री, जो कुंदकुंद भारती दिल्ली से प्रकाशित प्राकृत विद्या के प्रधान संपादक भी हैं,ने तिरुक्कुरल के जैन परंपरा से संबंध को लेकर महत्वपूर्ण तथ्य प्रस्तुत किए। उन्होंने बताया कि तिरुक्कुरल के मंगलाचरण में भगवान आदिनाथ का वर्णन मिलता है। इसके अंग्रेजी अनुवाद में भी भगवान आदिनाथ का नाम है बल्कि उन्हें वीतराग, सर्वज्ञ, सिद्ध व अष्ट गुणों से सुशोभित कहा गया है।

    डॉ. वीर सागर शास्त्री के अनुसार तिरुक्कुरल में प्रयुक्त अनेक शब्द और अवधारणाएं जैन परंपरा में प्रचलित हैं। साथ ही नरक आदि लोकों का वर्णन भी जैन परंपरा के अनुरूप मिलता है। इन सभी संदर्भों को देखते हुए तिरुक्कुरल को जैन परंपरा से संबंधित ग्रंथ के रूप में देखने के महत्वपूर्ण आधार मिलते हैं। उन्होंने इसे एक उल्लेखनीय साहित्यिक एवं दार्शनिक तथ्य बताते हुए कहा कि इस विषय को गंभीरता से अध्ययन और लिपिबद्ध किए जाने की आवश्यकता है।

    राष्ट्र संत आचार्य विद्यानंद जी की प्रेरणा से जैन समाज तक पहुंचा तिरुक्कुरल

    तिरुक्कुरल के जैन समाज में अध्ययन और प्रचार-प्रसार की दिशा में भी महत्वपूर्ण कार्य हुआ है। राष्ट्रसंत आचार्य विद्यानंद जी महाराज तिरुवल्लुवर के साहित्य का प्रमुखता से अध्ययन करते थे। उनकी प्रेरणा से कुंदकुंद भारती द्वारा वर्ष 1991 में तिरुक्कुरल का प्रकाशन किया गया। इस संस्करण का हिंदी अनुवाद पंडित गोविंद राय जैन शास्त्री ने किया था। ग्रंथ के प्रकाशन में भगवान बाहुबली स्वामी का चित्र भी विशेष रूप से अंकित है।

    कुंदकुंद भारती से तिरुक्कुरल के इस संस्करण के अब तक लगभग छह संस्करण में एक लाख प्रतियां प्रकाशित हो चुकी हैं। यह तथ्य इस बात को रेखांकित करता है कि जैन समाज में तिरुक्कुरल के अध्ययन और उसके संदेश को समझने की परंपरा काफी महत्वपूर्ण रही है। आचार्य विद्यानंद जी महाराज द्वारा इस ग्रंथ के अध्ययन और प्रकाशन को प्रोत्साहन दिया जाना इस दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय है।

    तिरुक्कुरल में जीवन के विविध पक्षों से जुड़े अनेक विषयों का विवेचन किया गया है। ये विषय व्यक्ति को अपने आचरण को श्रेष्ठ बनाने, परिवार और समाज के प्रति दायित्व समझने तथा सत्य, करुणा, संयम और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं।

    मानवता के लिए ग्रंथ, जैन समाज के लिए गौरव

    जैन पत्रकार महासंघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राजेन्द्र जैन् महावीर सनावद ने बताया कि तिरुक्कुरल का मूल संदेश संपूर्ण मानवता के लिए है। इसकी शिक्षाएं देश, काल और भाषा की सीमाओं से परे मनुष्य को श्रेष्ठ जीवन जीने की प्रेरणा देती हैं। यही कारण है कि आज इसके रूसी अनुवाद को रूस के राष्ट्रपति को भेंट किया जाना भारत की प्राचीन ज्ञान-परंपरा के वैश्विक सम्मान का प्रतीक माना जा रहा है।

    जैन समाज के लिए इस अवसर का महत्व और भी बढ़ जाता है। जिस तिरुक्कुरल को आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विश्व के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचा रहे हैं, जैन परंपरा उसे आचार्य कुंदकुंद की महान कृति के रूप में देखती है।

    आचार्य कुंदकुंद दिगंबर जैन समाज की आध्यात्मिक और दार्शनिक परंपरा के ऐसे महामनीषी हैं, जिनका नाम जैन धर्म के मंगलाचरण में श्रद्धापूर्वक लिया जाता है। ऐसे महान आचार्य की ज्ञान-परंपरा से जुड़े तिरुक्कुरल का विश्व मंच पर सम्मान होना निश्चित रूप से जैन समाज के लिए गौरव का विषय है।

    टी. के. वेद ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन को तिरुक्कुरल का रूसी संस्करण भेंट किए जाने से भारतीय ज्ञान-परंपरा का संदेश रूस तक पहुंचा है। साथ ही जैन समाज के लिए यह अवसर अपने महान आचार्य कुंदकुंद की साहित्यिक और दार्शनिक विरासत को स्मरण करने तथा उस पर गर्व करने का भी अवसर है।

    तिरुक्कुरल मानवता की धरोहर है और तिरुवल्लुवर के रूप में आचार्य कुंदकुंद का यह महान चिंतन आज विश्व मंच पर सम्मान पा रहा है—यह जैन समाज के लिए निश्चित रूप से आनंद, गौरव और आत्मीय प्रसन्नता का विषय है।

    मिशनसच न्यूज के लेटेस्ट अपडेट पाने के लिए हमारे व्हाट्सप्प ग्रुप को जॉइन करें।
    https://chat.whatsapp.com/JX13MOGfl1tJUvBmQFDvB1

    अन्य खबरों के लिए देखें मिशनसच नेटवर्क

    https://missionsach.com/category/india

    latest articles

    explore more

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here