अनार, अंजीर, कैक्टस और औषधीय पौधों की उन्नत पौध होगी तैयार, दुर्लभ प्रजातियों के संरक्षण में भी मिलेगी मदद
जोधपुर। थार के शुष्क क्षेत्र में बागवानी को बढ़ावा देने और किसानों को गुणवत्तापूर्ण पौध सामग्री उपलब्ध कराने की दिशा में कृषि विश्वविद्यालय जोधपुर ने महत्वपूर्ण पहल की है। विश्वविद्यालय में पश्चिमी राजस्थान की पहली अत्याधुनिक पादप ऊतक संवर्धन प्रयोगशाला (प्लांट टिश्यू कल्चर लैब) स्थापित की गई है। इस प्रयोगशाला में कम समय में अनार, अंजीर, कैक्टस और औषधीय फसलों के रोगमुक्त क्लोनल पौधे तैयार किए जा सकेंगे।

विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. वीरेंद्र सिंह जैतावत के मार्गदर्शन में स्थापित इस प्रयोगशाला को जल ग्रहण विकास एवं भू-संरक्षण विभाग के वित्तीय सहयोग से तैयार किया गया है। इससे क्षेत्र के किसानों को उन्नत पौध सामग्री उपलब्ध कराने के साथ बागवानी फसलों की गुणवत्ता सुधारने और दुर्लभ पौध प्रजातियों के संरक्षण को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
किसानों को मिलेगी गुणवत्तापूर्ण पौध सामग्री
कुलगुरु प्रो. वीरेंद्र सिंह जैतावत ने बताया कि आधुनिक कृषि में जैव प्रौद्योगिकी और ऊतक संवर्धन तकनीक की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। इस प्रयोगशाला के माध्यम से कम समय में उच्च गुणवत्ता वाले और उन्नत किस्मों के क्लोनल पौधे तैयार किए जा सकेंगे।
उन्होंने कहा कि पश्चिमी राजस्थान की शुष्क जलवायु के अनुकूल बागवानी फसलों और औषधीय पौधों की गुणवत्ता सुधारने में यह प्रयोगशाला महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इससे किसानों को बेहतर पौध सामग्री उपलब्ध होगी और गुणवत्तापूर्ण पौधों के लिए दूसरे क्षेत्रों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
क्या है ऊतक संवर्धन तकनीक?
प्रयोगशाला के प्रभारी एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. प्रदीप पगारिया ने बताया कि ऊतक संवर्धन एक आधुनिक तकनीक है, जिसमें पौधे के छोटे से हिस्से, जैसे जड़, तना, पत्ती या कोशिकाओं की मदद से नए पौधे विकसित किए जाते हैं।
इस प्रक्रिया में नियंत्रित तापमान और जीवाणुरहित वातावरण में कृत्रिम पोषक माध्यम का उपयोग किया जाता है। उचित परिस्थितियों में इस तकनीक से कम समय में बड़ी संख्या में पौधे तैयार किए जा सकते हैं। स्वस्थ मूल पौध और उचित प्रयोगशाला प्रक्रिया अपनाने पर रोगमुक्त पौध सामग्री तैयार करने में भी मदद मिलती है।
इस तकनीक की विशेषता यह है कि पौध तैयार करने के लिए केवल पारंपरिक मौसम पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। प्रयोगशाला में नियंत्रित परिस्थितियों के कारण वर्ष के अलग-अलग समय में भी पौध तैयार करने का काम किया जा सकता है।
दुर्लभ और औषधीय पौधों का होगा संरक्षण
प्रयोगशाला में केवल व्यावसायिक बागवानी फसलों की पौध तैयार करने तक ही काम सीमित नहीं रहेगा। यहां विलुप्तप्राय और दुर्लभ पौध प्रजातियों के संरक्षण तथा औषधीय पौधों के संवर्धन पर भी काम किया जाएगा।
ऊतक संवर्धन के जरिए आनुवंशिक रूप से समान पौधे तैयार करने में मदद मिलती है। इससे चयनित पौधों के गुणों को बनाए रखते हुए उनकी संख्या बढ़ाई जा सकती है। ऐसे में यह तकनीक उन पौध प्रजातियों के संरक्षण में उपयोगी साबित हो सकती है, जिनकी प्राकृतिक उपलब्धता सीमित है या जिनका पारंपरिक तरीके से बड़े पैमाने पर संवर्धन कठिन है।
सूखा और लवणता सहन करने वाली किस्मों पर भी शोध
विश्वविद्यालय की इस प्रयोगशाला में वायरस और कीट-मुक्त उच्च गुणवत्ता वाली पौध का बड़े पैमाने पर उत्पादन, बागवानी फसलों की उन्नत पौध सामग्री तैयार करने और शुद्ध क्लोन विकसित करने जैसे कार्य किए जाएंगे।
इसके साथ ही पश्चिमी राजस्थान की परिस्थितियों के अनुकूल सूखा और लवणता सहन करने वाली नई किस्मों के विकास से जुड़े शोध पर भी ध्यान दिया जाएगा। क्षेत्रीय किसानों को बेहतर पौध उपलब्ध कराने के लिए प्रयोगशाला में लगातार अनुसंधान किया जाएगा।
पश्चिमी राजस्थान की बागवानी को मिलेगा प्रोत्साहन
पश्चिमी राजस्थान में कम वर्षा और शुष्क जलवायु के कारण खेती के सामने कई चुनौतियां रहती हैं। ऐसे में स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल गुणवत्तापूर्ण पौध सामग्री की उपलब्धता बागवानी के विस्तार में अहम भूमिका निभा सकती है।
कृषि विश्वविद्यालय जोधपुर की यह पहल किसानों को उन्नत पौध उपलब्ध कराने, औषधीय एवं दुर्लभ पौधों के संरक्षण और आधुनिक कृषि तकनीकों को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। प्रयोगशाला से किसानों को होने वाला वास्तविक लाभ पौधों की उपलब्धता, गुणवत्ता, लागत और क्षेत्र में उनके प्रदर्शन पर भी निर्भर करेगा।
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