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    व्यापार समझौते पर बातचीत जारी, लेकिन कुछ मुद्दों पर ‘लक्ष्मण रेखा’खींचकर अड़ा भारत

    नई दिल्ली। भारत इन दिनों एक विचित्र भू-राजनीतिक परिदृश्य से घिरा हुआ है। जिसमें एक ओर चीन के साथ एलएसी विवाद की समाप्ति के बाद संबंधों को फिर से पटरी पर लाने की कोशिशें हो रही हैं। तो दूसरी ओर अमेरिका के साथ 50 फीसदी पारस्परिक टैरिफ को लेकर तनाव की स्थिति बनी हुई है। लेकिन इन सबके बीच शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व देश के रुख को हर स्तर पर स्पष्ट करने में लगा हुआ है। शनिवार को विदेश मंत्री डॉ.एस.जयशंकर ने राजधानी में आयोजित किए गए ‘ईटी-वर्ल्ड लीडर्स फोरम’में इस संबंध में मोर्चा संभाला। सबसे पहले उन्होंने अमेरिकी टैरिफ और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर कहा कि दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते को लेकर बातचीत चल रही है। जिसका अभी तक फिलहाल कोई नतीजा नहीं निकला है। दोनों बड़े देश हैं, जिसमें संवाद पर रोक नहीं रहती है। वहीं, किसी ने भी ये नहीं कहा कि बातचीत बंद है। ऐसा भी नहीं है कि वहां कोई कट्टी है। लेकिन मामले में हमारी एक लक्ष्मण रेखा है, जिससे जुड़े मुद्दों पर सरकार किसी तरह का कोई समझौता करने के लिए तैयार नहीं है। जयशंकर का ये बयान रूस से कच्चे तेल की खरीद पर नाराज अमेरिका द्वारा भारत पर जुर्माने के तौर पर लगाए गए 25 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ के 27 अगस्त को लागू होने की डेडलाइन से करीब चार दिन पहले दिया गया है। उधर, अमेरिकी व्यापार वार्ताकारों की 25 से 29 अगस्त की नई दिल्ली यात्रा रोक दी गई है।
    उन्होंने 50 फीसदी टैरिफ को अनुचित और अविवेकपूर्ण करार देते हुए कहा, लक्ष्मण रेखा का संबंध प्राथमिक रूप से देश के किसानों के हितों और छोटे उत्पादकों से जुड़ा है। बतौर केंद्र सरकार के रूप में हम अपने किसानों और मझौले उत्पादकों के हितों की रक्षा करने के लिए न केवल प्रतिबद्ध हैं। बल्कि दृढ़ संकल्पित भी हैं। ऐसा कुछ नहीं है जिस पर हम कोई समझौता कर सकें। लेकिन अमेरिकी सरकार की कुछ मांगें साफ तौर पर हमारी लक्ष्मण रेखा को लांघ रही हैं। ये ऐसे क्षेत्र हैं, जिनका संबंध देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था से है। बताते चलें कि अमेरिका चाहता है कि उसके कृषि, मुर्गीपालन और डेयरी उत्पादों के लिए भारत अपना बाजार खोले। जिसके लिए देश तैयार नहीं है। इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह अमेरिका द्वारा जीएम पद्वति से तैयार किए गए मक्का, सोयाबीन को भारत में निर्यात करने की है। जीएम फसलें पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक हैं। पीएम मोदी ने स्वतंत्रता दिवस को दिए अपने भाषण में भी कहा था कि मोदी किसानों, मछुआरों और जीव-जंतुओं के खिलाफ किसी भी हानिकारक नीति के विरूद्ध दीवार बनकर खड़ा है।
    भारत की तेल खरीद को यूक्रेन युद्ध में रूस का ईंधन बढ़ाने वाले अमेरिका-यूरोप के तर्क पर विदेश मंत्री ने निशाना साधते हुए कहा, भारत की तेल खरीद राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय हितों की पूर्ति करती है। देश के पास स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता है, हम ऐसे निर्णय लेते हैं जो राष्ट्रीय हित में हैं। ये हास्यास्पद है कि जो लोग अमेरिकी प्रशासन में व्यापार समर्थक के तौर पर काम करते हैं। वो बाकी देशों पर व्यापार करने का आरोप लगा रहे हैं। अगर आपको भारत और उसके परिष्कृत अन्य उत्पादों को खरीदने में परेशानी है तो आप उन्हें मत खरीदिए। इसके लिए कोई आपको मजबूर भी नहीं करेगा। यूरोप खरीदता है, अमेरिका खरीदता है। इसलिए अगर आपको ये पसंद नहीं है तो आप न खरीदें। उन्होंने पश्चिम के विवादित तर्क का जिक्र करते हुए कहा कि रूस से यूरोप का कुल व्यापार भारत की तुलना में कई गुना अधिक है। ऐसे में जब लोग कहते हैं कि भारत, रूस से तेल खरीदकर उसे यूक्रेन युद्ध को बढ़ावा देने के लिए ईंधन यानी धन मुहैया करा रहा है। तो यूरोप के खजाने के पैसे से क्या हो रहा है? अगर आप ऊर्जा की बात करते हैं। तब भी वो हमसे आगे हैं। भारत का रूस को निर्यात बढ़ा है। लेकिन ये उतना भी नहीं है जितना बताया जा रहा है। जयशंकर ने ये भी साफ किया कि भारत को अपने राष्ट्रीय हित में निर्णय लेने का पूरा अधिकार है और उसे ही सामरिक स्वायत्तता कहते हैं।

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