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    जज द्वारा ट्रेन की फर्श पर पेशाब करने पर सुप्रीम कोर्ट बोला-उन्हें बर्खास्त करना था

    नई दिल्ली। विशेष संवाददाता सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने मध्य प्रदेश के एक न्यायिक अधिकारी (Judge) द्वारा ट्रेन की कोच में फर्श पर पेशाब (Urinating on the floor) करना, हंगामा करने और महिला सह यात्री के सामने अश्लील हरकत किए जाने को आरोपों को ‘घिनौना कृत्य’ बताया। शीर्ष अदालत ने मौखिक तौर पर कहा कि न्यायिक अधिकारी का आचरण सबसे ‘गंभीर किस्म का दुर्व्यवहार था और उन्हें बर्खास्त किया जाना चाहिए था। जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के उस फैसले पर रोक लगाते हुए, यह टिप्पणी की है, जिसमें ट्रेन की कोच में फर्श पर पेशाब करना, हंगामा करने और महिला सह यात्री के सामने अश्लील हरकत करने के आरोप में बर्खास्त किए गए न्यायिक अधिकारी को दोबारा बहाल करने का आदेश दिया गया था।

     

     

    पीठ ने कहा कि यह मामला अपने आप में चौंकाने वाला है और अधिकारी का आचरण घिनौना था। जस्टिस मेहता ने कहा कि ‘अधिकारी ने कंपार्टमेंट में पेशाब किया! वहां एक महिला मौजूद थी।’ सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल द्वारा उच्च न्यायालय के दो जजों की पीठ के फैसले के खिलाफ दाखिल अपील पर नोटिस जारी करते हुए यह टिप्पणी की है। पीठ ने न्यायिक अधिकारी और मध्य प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया। अपील में, उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी गई है। मामले की सुनवाई के दौरान उक्त न्यायिक अधिकारी की ओर से पेश अधिवक्ता ने पीठ से कहा कि मेडिकल जांच रिपोर्ट के अनुसार, उनका मुवक्किल घटना के समय नशे में नहीं था। शीर्ष अदालत में दाखिल याचिका के मुताबिक न्यायिक अधिकारी मध्य प्रदेश में एक सिविल जज (क्लास-II) था, को 2018 में ट्रेन में किए गए हंगामे के कारण बर्खास्त कर दिया गया था।

     

    उस पर नशे की हालत में सह-यात्रियों के साथ दुर्व्यवहार करने और टीटीई (ड्यूटी पर मौजूद एक सरकारी कर्मचारी) को गाली देने, एक महिला यात्री के सामने अश्लील हरकत करने और सीट पर पेशाब करने का भी आरोप था। साथ ही सह-यात्रियों को अपना पहचान पत्र दिखाकर धमकाने का भी आरोप था। इस इस घटना के बाद, उक्त न्यायिक अधिकारी के खिलाफ दो समानांतर कार्यवाही (आपराधिक और विभागीय) शुरू की गईं। आपराधिक मामले में गिरफ्तारी के बाद, उसे जमानत मिल गई, लेकिन उसने अपने कंट्रोलिंग ऑफिसर को सूचित नहीं किया। आखिरकार, आपराधिक कार्यवाही में, उसे बरी कर दिया गया क्योंकि गवाह (जिसमें टीटीई और पीड़ित यात्री शामिल थे) मुकर गए। हालांकि, विभागीय कार्यवाही में, कई लोगों ने न्यायिक अधिकारी के अश्लील आचरण, अधिकार के दुरुपयोग और एक सरकारी कर्मचारी को बाधा पहुंचाने के बारे में गवाही दी। विभागीय जांच में दोषी पाए जाने के बाद न्यायिक अधिकारी को नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। इसके खिलाफ न्यायिक अधिकारी ने हाई उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की।

    उच्च न्यायालय ने याचिका को स्वीकार करते हुए न्यायिक अधिकारी के बर्खास्तगी आदेश को रद्द कर दिया। अब उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल की है। याचिका में कहा गया है कि घटना के समय प्रतिवादी (न्यायिक अधिकारी) का आचरण एक न्यायिक अधिकारी के लिए अशोभनीय था। इसके अलावा, इस घटना की व्यापक रूप से रिपोर्ट की गई, जिससे पूरी न्यायपालिका की पवित्रता को ठेस पहुंची। याचिका में इस बात पर जोर दिया गया है कि आपराधिक कार्यवाही के लिए सबूत का मानक उचित संदेह से परे है, जबकि विभागीय कार्यवाही के लिए यह संभावनाओं की प्रधानता है।

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