विशेषज्ञों ने अरावली क्षेत्र की पारिस्थितिकी, कृषि और पर्यावरण संतुलन पर रखे ठोस सुझाव
मिशनसच न्यूज, उदयपुर। जनार्दन राय नगर राजस्थान विद्यापीठ, उदयपुर में आयोजित चतुर्थ विश्व जल सम्मेलन के प्रथम दिवस पर अरावली क्षेत्र की पारिस्थितिकी, पर्यावरण संरक्षण और कृषि स्थिरता को केंद्र में रखते हुए देश-विदेश के प्रतिष्ठित विद्वानों, नीति निर्माताओं, पर्यावरणविदों और तकनीकी विशेषज्ञों ने व्यापक मंथन किया। सम्मेलन का उद्देश्य अरावली पर्वतमाला के पारिस्थितिक महत्व, पर्यावरणीय संतुलन में उसकी भूमिका और मानव जीवन को सहारा देने वाली उसकी क्षमताओं पर गंभीर चर्चा करना रहा।
कार्यक्रम की शुरुआत दो महत्वपूर्ण पुस्तकों के विमोचन से हुई। “आओ अरावली को जाने” और “स्वराज आदिज्ञान विरासत यात्रा” पुस्तकों के माध्यम से अरावली की पारिस्थितिकी, सांस्कृतिक विरासत और स्थानीय ज्ञान परंपराओं को समाज तक पहुँचाने का प्रयास किया गया।
उद्घाटन सत्र में जलपुरुष डॉ. राजेंद्र सिंह ने अरावली पर्वतमाला को देश की जीवनरेखा बताते हुए इसके संरक्षण की तत्काल आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि पर्वत केवल भौगोलिक संरचना नहीं, बल्कि जल, जैव विविधता, संस्कृति और आजीविका का आधार हैं।
प्रो. सारंगदेवोत ने विकास और सततता के संतुलन की जरूरत पर जोर देते हुए भूजल क्षरण, जैव विविधता ह्रास और अनियंत्रित खनन जैसी चुनौतियों की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने वैज्ञानिक विनियमन और पारिस्थितिक आर्थिक मॉडल अपनाने की वकालत की।
विधिक विशेषज्ञ अनुपम सराफ ने संवैधानिक सिद्धांतों और उपग्रह मानचित्रण के आधार पर पर्वतीय क्षेत्रों के संरक्षण की रूपरेखा प्रस्तुत की। विदेशी विशेषज्ञों बैस्टियन मोहरमान और हेल्मुट किन्ज़ेलमैन ने समुदाय आधारित संरक्षण और प्रकृति-केंद्रित सोच की आवश्यकता बताई।
सम्मेलन में जैविक खेती, मृदा संरक्षण, सतत कृषि पद्धतियों, वैज्ञानिक मानचित्रण और सामुदायिक सहभागिता को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया गया। साथ ही अरावली क्षेत्र में विश्वविद्यालयों और विद्यालयों के माध्यम से व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाने की घोषणा की गई।
समापन सत्र में डॉ. इंदिरा खुराना ने दुर्लभ खनिज तत्वों के दोहन से जुड़े पर्यावरणीय प्रभावों पर चर्चा करते हुए जिम्मेदार और संतुलित संसाधन प्रबंधन की आवश्यकता बताई।
प्रथम दिवस की कार्यवाही ने स्पष्ट किया कि अरावली का भविष्य समेकित प्रयासों, वैज्ञानिक अनुसंधान और समाज की सक्रिय भागीदारी में निहित है, जिससे यह पर्वतमाला आने वाली पीढ़ियों के लिए भी पर्यावरणीय संतुलन बनाए रख सके।


