आरएसएस संघ प्रमुख मोहन भागवत बोले – शक्ति या लोकप्रियता नहीं, राष्ट्र निर्माण और सांस्कृतिक एकता ही लक्ष्य
मिशनसच न्यूज, मुंबई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के 100 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर मुंबई में आयोजित शताब्दी कार्यक्रम में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने संगठन के उद्देश्य, राष्ट्र निर्माण और सामाजिक एकता को लेकर विस्तार से विचार व्यक्त किए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि संघ ने प्रारंभ से ही यह तय किया है कि उसका एकमात्र कार्य संपूर्ण समाज को संगठित करना है और इसके अलावा कोई दूसरा लक्ष्य नहीं है।
भागवत ने कहा कि भारत केवल भाषणों से नहीं बल्कि अपने आचरण और उदाहरणों से विश्व गुरु बन सकता है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में यह क्षमता स्वाभाविक रूप से निहित है। उन्होंने सभी समुदायों को देश का अभिन्न हिस्सा बताते हुए कहा कि भारत के मुस्लिम और ईसाई भी इसी मिट्टी के हैं।
अपने संबोधन में उन्होंने हिंदू पहचान पर चर्चा करते हुए कहा कि देश में चार प्रकार के हिंदू हैं—एक वे जो गर्व से स्वयं को हिंदू कहते हैं, दूसरे जो इसे सामान्य बात मानते हैं, तीसरे जो संकोच से अपनी पहचान बताते हैं और चौथे वे जो अपनी पहचान भूल गए हैं या भूलने को विवश किए गए हैं। उन्होंने कहा कि समाज को अपनी जड़ों और संस्कृति से जुड़ना होगा।
डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का उल्लेख करते हुए भागवत ने बताया कि संघ संस्थापक ने कठिन परिस्थितियों में भी दो बातों को जीवन का आधार बनाया—शिक्षा में उत्कृष्टता और देशहित के कार्यों में सक्रिय भागीदारी। यही मूल्य संघ के कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा बने हुए हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि संघ को लोकप्रियता या सत्ता की लालसा नहीं है। देश में जो भी अच्छे कार्य हो रहे हैं, वे सफल हों, यही संघ की प्राथमिकता है। संघ का उद्देश्य केवल समाज को संगठित कर राष्ट्र निर्माण में योगदान देना है।
धर्मनिरपेक्षता के विषय पर भागवत ने कहा कि ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द की जगह ‘पंथनिरपेक्षता’ अधिक उपयुक्त है, क्योंकि धर्म जीवन का आधार है। उन्होंने यह भी कहा कि ‘हिंदू’ कोई संज्ञा नहीं बल्कि एक विशेषण है, जो भारत में रहने वाले सभी लोगों की सांस्कृतिक पहचान को दर्शाता है।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में स्वयंसेवक और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। शताब्दी वर्ष के अवसर पर संघ के सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रहित के कार्यों को आगे बढ़ाने का संकल्प भी लिया गया।


