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    चुनावी चंदे में फिर भाजपा की बल्ले बल्ले : एडीआर रिपोर्ट में भाजपा को 82% फंड

    चुनावी चंदे से राजनीति में हलचल तेज

    नई दिल्ली ।  राजनीति में आज सबसे बड़ी चर्चा चुनावी फंडिंग को लेकर है। चुनावी पारदर्शिता पर काम करने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ए डीआर) की ताज़ा रिपोर्ट ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में चुनावी ट्रस्टों द्वारा वितरित कुल लगभग 3,826 करोड़ की राशि में से करीब 82% हिस्सा भाजपा को प्राप्त हुआ। रिपोर्ट में बताया गया कि प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस को लगभग 7.8% राशि मिली, जबकि अन्य राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों को अपेक्षाकृत बहुत कम हिस्सा मिला। यह आंकड़ा राजनीतिक फंडिंग के वितरण में भारी असंतुलन की ओर संकेत करता है।

    क्या कहती है रिपोर्ट?

    एडीआर की रिपोर्ट चुनावी ट्रस्टों द्वारा राजनीतिक दलों को दिए गए चंदे के आधिकारिक आंकड़ों पर आधारित है। चुनावी ट्रस्ट वे संस्थाएं होती हैं जो कॉर्पोरेट या अन्य दानदाताओं से धन लेकर उसे विभिन्न राजनीतिक दलों में वितरित करती हैं।

    रिपोर्ट के मुख्य बिंदु 

    • कुल  3,826 करोड़ 

      भाजपा को: लगभग 3,157 करोड़ (करीब 82%) 

    • कांग्रेस को: लगभग 7 . 8% 
    • अन्य दलों को: शेष अल्पांश
      एडीआर ने अपने विश्लेषण में यह भी रेखांकित किया कि कुछ चुनिंदा ट्रस्टों के माध्यम से बड़ी मात्रा में धन एक ही दल को गया, जिससे राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में असमानता का प्रश्न खड़ा होता है।

    किन कंपनियों ने दिया सबसे ज्यादा चंदा?

    एडीआर रिपोर्ट के अनुसार प्रमुख कॉर्पोरेट दानदाताओं में शामिल हैं:

    • मेघा इंजीनियरिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (MEIL) 
    • भारती एयरटेल समूह से जुड़ी इकाइयाँ 
    • डीएलएफ समूह की कंपनियाँ 
    • टोरेंट पावर लिमिटेड 
    • वेदांता समूह से संबंधित संस्थाएँ 

    इन कंपनियों ने करोड़ों रुपये का योगदान विभिन्न चुनावी ट्रस्टों को दिया। रिपोर्ट बताती है कि अधिकांश बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों ने अपना दान एक या दो प्रमुख ट्रस्टों के माध्यम से भेजा, जिनमें “प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट” सबसे बड़ा रहा।

    चुनावी ट्रस्ट और पारदर्शिता का सवाल

    चुनावी फंडिंग लंबे समय से बहस का विषय रही है। पहले इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को लेकर विवाद हुआ था, और अब चुनावी ट्रस्टों के आंकड़े सामने आने के बाद एक बार फिर पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि:

    1. चंदे का अत्यधिक केंद्रीकरण किसी एक दल के पक्ष में राजनीतिक संतुलन बिगाड़ सकता है। 
    2. कॉर्पोरेट प्रभाव नीति निर्माण को प्रभावित कर सकता है। 
    3. पारदर्शिता के बावजूद आम मतदाता के लिए यह समझना कठिन है कि किस कंपनी या समूह ने किस राजनीतिक हित के तहत चंदा दिया। 

    हालांकि ट्रस्ट व्यवस्था को इलेक्टोरल बॉन्ड की तुलना में अधिक पारदर्शी माना जाता है, क्योंकि इसमें दान और वितरण का खुलासा किया जाता है।

     

    लोकतंत्र पर व्यापक प्रभाव

    भारतीय लोकतंत्र में बहुदलीय प्रणाली है, जहां समान अवसर की भावना महत्वपूर्ण है। यदि आर्थिक संसाधनों का वितरण अत्यधिक असमान हो, तो छोटे और क्षेत्रीय दलों के लिए अपनी बात मतदाताओं तक प्रभावी ढंग से पहुंचाना कठिन हो सकता है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि:

    • फंडिंग असमानता से चुनावी प्रतिस्पर्धा प्रभावित होती है। 
    • नीति निर्माण में बड़े दानदाताओं का अप्रत्यक्ष प्रभाव बढ़ सकता है। 
    • जनता का विश्वास कमजोर पड़ सकता है यदि उन्हें लगे कि राजनीति धन पर अत्यधिक निर्भर हो गई है। 

    दूसरी ओर, समर्थकों का तर्क है कि लोकतंत्र में दानदाता स्वतंत्र हैं और वे अपनी पसंद के दल को समर्थन दे सकते हैं।

    आगे क्या?

    एडीआर की रिपोर्ट के बाद यह संभावना है कि:

    • संसद या सार्वजनिक मंचों पर चुनावी फंडिंग सुधार की मांग तेज होगी। 
    • चुनाव आयोग से निगरानी तंत्र को और मजबूत करने की अपील की जा सकती है। 
    • पारदर्शिता बढ़ाने के लिए नए कानूनी प्रस्ताव सामने आ सकते हैं। 

    राजनीतिक वित्तपोषण का मुद्दा केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है; यह लोकतांत्रिक मूल्यों, पारदर्शिता और समान अवसर की बहस से जुड़ा हुआ है।

     

    एडीआर की ताज़ा रिपोर्ट ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत की चुनावी राजनीति में आर्थिक संसाधनों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है। जब कुल वितरित राशि का 82% हिस्सा एक ही दल को मिलता है, तो यह स्वाभाविक है कि विपक्ष सवाल उठाए।

    आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या चुनावी फंडिंग व्यवस्था में कोई संरचनात्मक सुधार होता है या यह मुद्दा भी राजनीतिक बहस तक सीमित रह जाता है।

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