मतुआ वोट पर चुनावी जंग: परिवार की दो धारणाएं आमने-सामने
बागदा। पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले की बागदा सीट पर इस बार मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है। भारतीय जनता पार्टी की प्रत्याशी सोमा ठाकुर का सामना तृणमूल कांग्रेस की उम्मीदवार मधुपर्णा ठाकुर से है।
इस चुनाव की खास बात यह है कि सोमा ठाकुर, केंद्रीय मंत्री शांतनु ठाकुर की पत्नी हैं, जबकि मधुपर्णा ठाकुर रिश्ते में उनकी ननद लगती हैं। ऐसे में यह मुकाबला राजनीतिक ही नहीं, बल्कि भावनात्मक और प्रतीकात्मक रूप से भी बेहद अहम हो गया है।
ननद-भाभी की इस सियासी लड़ाई में मतुआ समुदाय का वोट सबसे बड़ा फैक्टर बनकर उभरा है। शांतनु ठाकुर के परिवार का इस समुदाय में गहरा प्रभाव माना जाता है, जिससे यह चुनाव और भी महत्वपूर्ण हो गया है। एक ही परिवार के भीतर दो अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराएं—एक भाजपा के साथ और दूसरी तृणमूल के साथ—आमने-सामने हैं।
भाजपा ठाकुर उपनाम और मतुआ पहचान के सहारे वोटों का ध्रुवीकरण करने की कोशिश कर रही है। सोमा ठाकुर को उम्मीदवार बनाना भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
मतुआ समुदाय की नींव 19वीं सदी में समाज सुधारक हरिचंद ठाकुर ने रखी थी, जिसे उनके पुत्र गुरुचंद ठाकुर ने आगे बढ़ाया। यह आंदोलन दलित-नामशूद्र समुदाय के सामाजिक और धार्मिक उत्थान से जुड़ा रहा है।
बांग्लादेश (पूर्वी पाकिस्तान) से आए शरणार्थियों के बीच इस समुदाय का गहरा प्रभाव रहा है। ठाकुर परिवार, जिसे आमतौर पर ठाकुरबाड़ी कहा जाता है, इस आंदोलन का केंद्र रहा है और आज भी इसका राजनीतिक प्रभाव कायम है।
बंगाल की राजनीति में मतुआ समुदाय को किंगमेकर माना जाता है। करीब 2 से 3 करोड़ मतुआ वोटरों का असर 60 से 70 विधानसभा सीटों पर पड़ता है। बागदा, बोनगांव और ठाकुरनगर जैसे क्षेत्रों में इनकी भूमिका निर्णायक रहती है।
भाजपा ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और शरणार्थी मुद्दों के जरिए इस समुदाय में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की है। वहीं, बागदा विधानसभा सीट पर पिछले तीन चुनावों से तृणमूल कांग्रेस का कब्जा बना हुआ है।
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