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    60 साल पुराने गन्ना कानून में बदलाव की तैयारी, इथेनॉल और डिजिटल नियम शामिल

    नई दिल्ली। केंद्र सरकार देश के चीनी क्षेत्र को आधुनिक बनाने के लिए एक युगांतकारी बदलाव की ओर कदम बढ़ा रही है। सरकार ने वर्ष 1966 के पुराने 'गन्ना नियंत्रण आदेश' (Sugarcane Control Order) को प्रतिस्थापित कर एक नया कानून लाने का मसौदा (ड्राफ्ट) तैयार किया है। इस नए कानून का उद्देश्य चीनी मिलों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाना और इथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देना है।

    इथेनॉल अब चीनी उद्योग का अभिन्न हिस्सा

    नए ड्राफ्ट में सबसे क्रांतिकारी बदलाव इथेनॉल को लेकर किया गया है:

    • नई परिभाषा: अब चीनी मिलों की आधिकारिक परिभाषा में उन इकाइयों को भी शामिल किया जाएगा जो गन्ने के रस, सिरप या शीरे (मोलासेस) से सीधे इथेनॉल बनाती हैं।
    • उत्पादन का पैमाना: गणना को सरल बनाने के लिए सरकार ने तय किया है कि 600 लीटर इथेनॉल को 1 टन चीनी के बराबर माना जाएगा।
    • इकाईयों को राहत: जो इकाइयां गन्ना नहीं पीसतीं और केवल इथेनॉल बनाती हैं, उनके लिए बैंक गारंटी की शर्तों को उदार बनाया गया है ताकि निवेश को प्रोत्साहन मिले।

    किसानों के हित रहेंगे सुरक्षित

    कानून नया होने के बावजूद किसानों से जुड़े बुनियादी नियमों को यथावत रखा गया है:

    • उचित मूल्य (FRP): गन्ने के लाभकारी मूल्य की व्यवस्था जारी रहेगी।
    • समय पर भुगतान: गन्ना आपूर्ति के 14 दिनों के भीतर किसानों को भुगतान करना अनिवार्य होगा।
    • ब्याज का प्रावधान: भुगतान में देरी होने पर मिलों को किसानों को 15% वार्षिक ब्याज देना होगा।

    लाइसेंस और डिजिटल मॉनिटरिंग के नए नियम

    सरकार ने मिलों के संचालन और उनकी मंजूरी की प्रक्रिया को अधिक सख्त और स्पष्ट बनाया है:

    • समय सीमा और दूरी: नई फैक्ट्री खोलने के लिए न्यूनतम दूरी और प्रोजेक्ट पूरा करने की एक निश्चित समय सीमा तय की गई है।
    • लाइसेंस रद्दीकरण: यदि कोई चीनी मिल लगातार 7 वर्षों तक बंद रहती है, तो उसका लाइसेंस स्वतः रद्द माना जा सकता है।
    • डिजिटल ट्रैकिंग: हर फैक्ट्री को एक विशिष्ट कोड दिया जाएगा और ऑनलाइन रिपोर्टिंग अनिवार्य होगी, जिससे सरकार रियल-टाइम मॉनिटरिंग कर सकेगी।

    उद्योग जगत की प्रतिक्रिया

    चीनी उद्योग के संगठनों ने इस पहल का स्वागत किया है। उनका मानना है कि 1966 का कानून वर्तमान तकनीक और इथेनॉल की बढ़ती मांग के हिसाब से पुराना हो चुका था। हालांकि, कुछ विशेषज्ञों ने खांडसारी इकाइयों पर बढ़ती सख्ती को लेकर पुनर्विचार की मांग की है।

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