चार दशक में बदल गया भारत का राजनीतिक भूगोल और इतिहास
निलेश कांठेड़, स्वतंत्र पत्रकार एवं विश्लेषक,भीलवाड़ा
वर्ष 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 400 से अधिक सीटों के साथ प्रचंड जीत मिली थी, जबकि भाजपा लोकसभा में मात्र दो सीटों पर सिमट गई थी। उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि चार दशक बाद ऐसा भी दौर आएगा, जब भाजपा स्वयं के बल पर या सहयोगियों के साथ देश के 22 से अधिक राज्यों में सत्ता में होगी और कांग्रेस केवल चार-पांच राज्यों तक सीमित रह जाएगी।
स्वतंत्रता के बाद जनसंघ और वर्ष 1980 में भाजपा के रूप में राजनीति करने वाली यह पार्टी आज कश्मीर से लेकर केरल और बंगाल से लेकर राजस्थान तक लगभग हर राज्य में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुकी है। ऐसा कोई राज्य नहीं बचा जहां भाजपा का कोई विधायक न हो। दूसरी ओर वर्ष 1885 में स्थापित देश का सबसे पुराना राजनीतिक दल कांग्रेस, जिसके बारे में कभी माना जाता था कि चारों दिशाओं में उसी का राजनीतिक प्रभाव दिखाई देता है, आज कुछ राज्यों की सत्ता तक सिमटकर रह गया है।
हाल ही में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों ने भाजपा के विस्तार को और गति प्रदान की है, वहीं कांग्रेस की सिमटती “वोटों की चादर” एक बार फिर सामने आ गई है। भाजपा ने असम में सत्ता कायम रखने के साथ तृणमूल कांग्रेस के लंबे शासन को समाप्त कर पश्चिम बंगाल में पहली बार सत्ता हासिल की। पुदुचेरी में भी भाजपा नीत एनडीए सरकार कायम रही। इसके विपरीत कांग्रेस केवल केरल में सत्ता हासिल कर पाई, लेकिन वहां भी उसे वामपंथी दलों के साथ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा। तमिलनाडु में कांग्रेस, डीएमके के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के बावजूद सत्ता से बाहर रही।
भाजपा ने केरल में भी पहली बार विधानसभा चुनाव में तीन सीटें जीतकर दक्षिण भारत के उस अंतिम राज्य में भी अपना खाता खोल लिया, जहां अब तक उसका कोई विधायक निर्वाचित नहीं हुआ था। यह पूरा राजनीतिक परिदृश्य साफ संकेत देता है कि भाजपा का राजनीतिक विस्तार लगातार बढ़ रहा है और जिन क्षेत्रों में कुछ वर्ष पहले तक उसे “अछूत” समझा जाता था, वहां भी उसकी स्वीकार्यता बढ़ती जा रही है।
इसके विपरीत, स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व करने वाली कांग्रेस उन क्षेत्रों से भी सिमटती जा रही है, जहां कई दशकों तक उसका निरंतर शासन रहा। उत्तरप्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे बड़े राज्यों में कांग्रेस अब अपने दम पर चुनाव लड़कर प्रमुख विपक्षी दल बनने की स्थिति में भी नहीं दिखती। कई राज्यों में वह क्षेत्रीय दलों के नेतृत्व में सहयोगी की भूमिका निभाने को विवश है।
विधायिकाओं में कांग्रेस के घटते जनप्रतिनिधित्व का असर उसके संगठनात्मक ढांचे पर भी दिखाई दे रहा है। देशभर में कांग्रेस संगठन पहले की तुलना में कमजोर हुआ है। इसके विपरीत भाजपा की स्थिति मजबूत होती दिखाई देती है। बिहार जैसे राज्यों में जहां भाजपा पहले सहयोगी दल के रूप में सत्ता में आती थी, वहीं अब उसके विधायक मुख्यमंत्री बन रहे हैं और पुराने प्रमुख दल सहयोगी की भूमिका में पहुंच गए हैं।
यदि आज के राजनीतिक परिदृश्य की तुलना चार दशक पहले के भारत से की जाए तो साफ दिखाई देता है कि राजनीति में समय हमेशा परिवर्तनशील रहता है। किसी भी दल या नेता को स्थायी रूप से मजबूत या कमजोर मान लेना उचित नहीं होता। लोकतंत्र में मतदाता ही अंतिम निर्णायक होता है।
विधानसभा चुनावों में लंबे समय तक मजबूत माने जाने वाले नेताओं की हार यह संकेत देती है कि जनता जब चाहती है तो किसी को फर्श से अर्श तक पहुंचा देती है और जब चाहती है तो सत्ता के शिखर पर बैठे नेताओं को जमीन भी दिखा देती है। मतदाताओं की यही शक्ति लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखती है और उसे निरंतर प्रासंगिक बनाती है।

स्टोरी राइटर बीस वर्ष तक राजस्थान पत्रिका में संपादकीय विभाग में विभिन्न पदों पर सेवा देने के बाद पिछले छह वर्ष से स्वतंत्र पत्रकार एवं विश्लेषक के रूप में सक्रिय हैं
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