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    क्या पाकिस्तान ने अमेरिकी हमले के डर से ईरानी विमानों को दी पनाह?

    इस्लामाबाद/वॉशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य टकराव ने दक्षिण एशिया की कूटनीति में एक नया उबाल ला दिया है। हालिया चर्चाओं ने इस कयास को हवा दी है कि क्या पाकिस्तान आज से 53 साल पुराने उस एहसान का बदला चुका रहा है, जो ईरान ने 1971 के युद्ध के दौरान उस पर किया था। दावा किया जा रहा है कि ईरान ने अमेरिकी जवाबी कार्रवाई के डर से अपने सैन्य विमानों के बेड़े को पाकिस्तान के नूर खान एयरबेस पर सुरक्षित ठिकाना दिया है। हालाँकि, पाकिस्तानी प्रशासन ने इन खबरों को पूरी तरह निराधार बताते हुए स्पष्ट किया है कि आबादी के बीच स्थित इस बेस पर विमानों को छिपाना तकनीकी रूप से असंभव है।

    1971 का वो दौर जब ईरान बना था पाकिस्तान का रक्षक

    यह वर्तमान स्थिति इतिहास के उन पन्नों को पलटती है जब 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान ईरान ने पाकिस्तान की ढाल बनकर मदद की थी। उस समय ईरान के शाह मोहम्मद रजा पहलवी ने संकट की घड़ी में पाकिस्तान के लिए अपने एयरबेस के दरवाजे खोल दिए थे। जब भारतीय वायुसेना की बमबारी से पाकिस्तानी विमानों पर अस्तित्व का संकट मंडरा रहा था, तब ईरान ने न केवल उन्हें शरण दी, बल्कि गुप्त रूप से ईंधन, गोला-बारूद और सैन्य हेलीकॉप्टरों की आपूर्ति भी जारी रखी थी। आज की हलचल को इसी ऐतिहासिक कर्ज की अदायगी के रूप में देखा जा रहा है।

    महाशक्तियों के बीच पाकिस्तान का खतरनाक कूटनीतिक संतुलन

    ईरान और अमेरिका के बीच पाकिस्तान की स्थिति एक दोधारी तलवार पर चलने जैसी हो गई है। एक ओर पाकिस्तान चीन के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को गहरा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर वह अमेरिका के साथ अपने पुराने और तनावपूर्ण सैन्य संबंधों को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश में जुटा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरानी विमानों को पनाह देने की बात में थोड़ी भी सच्चाई निकलती है, तो यह पाकिस्तान के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आत्मघाती कदम साबित हो सकता है। रिपब्लिकन सांसद लिंडसे ग्राहम जैसे अमेरिकी नेताओं ने पहले ही चेतावनी दे दी है कि ऐसी स्थिति में अमेरिका को पाकिस्तान की मध्यस्थ की भूमिका पर पुनर्विचार करना पड़ेगा।

    विश्वसनीयता का संकट और बदलती वैश्विक राजनीति

    आधी सदी के बाद आज कूटनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं, लेकिन पाकिस्तान के प्रति अमेरिकी संदेह की दीवार अभी भी ऊँची है। ओसामा बिन लादेन के मामले और चरमपंथी समूहों के इतिहास के कारण अमेरिकी सुरक्षा प्रतिष्ठान पाकिस्तान की हर हरकत को शक की निगाह से देखता है। वर्तमान में ईरान अमेरिका का कट्टर दुश्मन है और ऐसे में पाकिस्तान का कथित तौर पर ईरान की मदद करना उसे वैश्विक राजनीति के केंद्र में ला खड़ा करता है। इन दावों ने न केवल दक्षिण एशिया बल्कि मध्य पूर्व की राजनीति में भी नई हलचल पैदा कर दी है, जिससे आने वाले दिनों में कूटनीतिक टकराव बढ़ने के आसार हैं।

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