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    रेगिस्तान में बन रहा ‘तबाही का सामान’? सैटेलाइट तस्वीरों से सामने आई नई जानकारी

    बीजिंग: वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था और रणनीतिक संतुलन के बीच चीन की एक नई सैन्य गतिविधि ने दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों को चिंता में डाल दिया है। हाल ही में सामने आईं सैटेलाइट तस्वीरों से पता चलता है कि चीन अपने परमाणु मिसाइल साइलो (जमीन के नीचे बने मिसाइल बेस) के इर्द-गिर्द एक बेहद अत्याधुनिक और विस्तृत सैन्य बुनियादी ढांचा तैयार कर रहा है। इस गोपनीय नेटवर्क में नए लॉन्च पैड, बख्तरबंद बंकर और हाई-टेक संचार केंद्र (कम्युनिकेशन सेंटर्स) शामिल हैं।

    सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि इस विशाल निर्माण का मुख्य मकसद यह सुनिश्चित करना है कि यदि अमेरिका भविष्य में चीन के परमाणु ठिकानों पर पहले हमला (फर्स्ट स्ट्राइक) करता है, तो चीन उसे पूरी तरह नाकाम कर सके। इसके साथ ही, विपरीत परिस्थितियों में भी चीन की जवाबी हमला करने की क्षमता (सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी) पूरी तरह सुरक्षित रहे। आइए, सवाल-जवाब के जरिए समझते हैं कि चीन की इस खुफिया और बड़ी तैयारी के पीछे का पूरा गणित क्या है:

    सवाल: सैटेलाइट से मिलीं नई तस्वीरों में क्या नजर आ रहा है?

    जवाब: रक्षा रिपोर्टों और उपग्रह से प्राप्त तस्वीरों के मुताबिक, चीन अपने सुदूर रेगिस्तानी इलाकों में बड़े पैमाने पर सैन्य ढांचे का विस्तार कर रहा है। परमाणु मिसाइल अड्डों के चारों तरफ नए लॉन्च पैड, मजबूत बंकर और कमांड सेंटर बनाए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह पूरा जाल चीन की परमाणु मिसाइलों को सुरक्षित रखने और संकट के समय उन्हें तुरंत ऑपरेट करने के लिए बुना जा रहा है।

    सवाल: चीन यह निर्माण किन संवेदनशील इलाकों में कर रहा है?

    जवाब: यह नया और विशाल सैन्य परिसर मुख्य रूप से शिनजियांग और गांसू प्रांत के सीमावर्ती इलाकों में विकसित किया जा रहा है। ये वही दुर्गम क्षेत्र हैं, जहाँ चीन ने अपनी सबसे खतरनाक और लंबी दूरी तक मार करने वाली अंतरमहाद्वीपीय परमाणु मिसाइलों के साइलो बना रखे हैं। ये साइलो चीन की जमीनी परमाणु ताकत की रीढ़ माने जाते हैं।

    सवाल: इन तस्वीरों में किस तरह के नए निर्माण चिह्नित किए गए हैं?

    जवाब: तस्वीरों में 80 से अधिक ऐसे नए मिलिट्री स्ट्रक्चर्स दिखाई दिए हैं, जिनका उपयोग मोबाइल मिसाइल लॉन्चरों को छुपाने और हवाई रक्षा प्रणालियों (एयर डिफेंस सिस्टम) की तैनाती के लिए किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, वहां इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर (ई-युद्ध), सैटेलाइट कम्युनिकेशन और उन्नत कमांड ऑपरेशंस से जुड़ी संदिग्ध इमारतें भी देखी गई हैं।

    सवाल: रक्षा मामलों के अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ इस पर क्या राय रख रहे हैं?

    जवाब: हवाई स्थित पैसिफिक फोरम के वरिष्ठ फेलो अलेक्जेंडर नील के अनुसार, यह बुनियादी ढांचा बेहद असाधारण और बड़े स्तर पर तैयार किया जा रहा है। यह मिसाइल साइलो के मुख्य क्षेत्रों से बाहर निकलकर हजारों वर्ग किलोमीटर के रेगिस्तानी इलाके को कवर कर रहा है। भले ही इसकी वास्तविक क्षमताएं आने वाले समय में पूरी तरह स्पष्ट होंगी, लेकिन यह साफ है कि चीन अपनी रणनीतिक परमाणु प्रतिरोधक क्षमता को तेजी से बढ़ा रहा है।

    सवाल: चीन के लिए अपने इन मिसाइल साइलो की सुरक्षा इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?

    जवाब: चीन हमेशा से यह कहता रहा है कि उसकी परमाणु नीति न्यूनतम लेकिन पूरी तरह विश्वसनीय रक्षा तंत्र पर आधारित है। इसका सीधा मतलब यह है कि खुद पर परमाणु हमला होने की स्थिति में वह दुश्मन को पूरी तरह तबाह करने की क्षमता रखता हो। विशेषज्ञों के मुताबिक, इन साइलो के चारों तरफ सुरक्षा का यह अभेद्य घेरा बनाना इसी रक्षा रणनीति का एक अनिवार्य हिस्सा है।

    सवाल: क्या चीन अपनी परमाणु नीति में कोई बदलाव कर रहा है?

    जवाब: आधिकारिक तौर पर चीन की नीति 'नो फर्स्ट यूज' (पहले इस्तेमाल नहीं करने) की है। यानी वह किसी भी युद्ध में पहले परमाणु हथियार नहीं चलाएगा। हालांकि, पश्चिमी राजनयिकों और रणनीतिकारों का मानना है कि ताइवान जैसे संवेदनशील मुद्दों पर यदि कोई बड़ा टकराव होता है, तो चीन अपनी इस मजबूत होती परमाणु ताकत का इस्तेमाल विरोधी देशों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए कर सकता है।

    सवाल: इन नए सैन्य परिसरों की बनावट कैसी है और इनका केंद्र कहां है?

    जवाब: पूर्वी शिनजियांग में हमाई परमाणु साइलो क्षेत्र से लगभग 140 और 230 किलोमीटर की दूरी पर पिछले छह सालों के भीतर दो अष्टकोणीय (ऑक्टागोनल) सैन्य परिसर बनाए गए हैं। इन हाई-टेक अड्डों पर भारी सैन्य वाहनों और सैनिकों के रहने की पूरी व्यवस्था है। इसके अलावा वहां हथियार डिपो, कंक्रीट के बंकर, हवाई पट्टियां और सीधे संपर्क के लिए रेलवे लाइनें भी बिछाई गई हैं।

    सवाल: क्या यह पूरी तरह साफ है कि इन गुप्त ठिकानों का इस्तेमाल किस काम के लिए होगा?

    जवाब: नहीं, विशेषज्ञ मानते हैं कि अभी यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि इन नए लॉन्च पैड्स पर किस प्रकार के घातक हथियार तैनात किए जाएंगे या इन अष्टकोणीय परिसरों के भीतर वास्तव में किस स्तर की गतिविधियां चल रही हैं। हालांकि, उनका अनुमान यही है कि इनका उपयोग मोबाइल मिसाइल यूनिट्स, वायु रक्षा और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के संचालन को मजबूती देने के लिए होगा।

    सवाल: चीन की इस बढ़ती परमाणु ताकत पर अमेरिका का क्या आकलन है?

    जवाब: अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (पेंटागन) और हथियार नियंत्रण विशेषज्ञों का दावा है कि चीन दुनिया के किसी भी अन्य देश के मुकाबले सबसे तेज गति से अपने परमाणु जखीरे का विस्तार कर रहा है। पेंटागन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, चीन साल 2030 तक 1,000 से अधिक सक्रिय परमाणु हथियार तैनात करने के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। रिपोर्ट यह भी कहती है कि चीन ने अपने तीन मुख्य मिसाइल क्षेत्रों में करीब 100 अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें (ICBM) पहले ही तैनात कर दी हैं।

    सवाल: चीन का मिसाइल अटैक अर्ली वार्निंग सिस्टम कितना मजबूत है?

    जवाब: अमेरिकी खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, चीन ने अपने 'हुओयान-1' सैटेलाइट नेटवर्क के जरिए अपनी प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (अर्ली वार्निंग सिस्टम) को बेहद सटीक बना लिया है। यह सैटेलाइट नेटवर्क दुश्मन की ओर से आने वाली किसी भी बैलिस्टिक मिसाइल का पता महज 90 सेकंड के भीतर लगा सकता है और कुछ ही मिनटों में इसकी सटीक जानकारी कमांड सेंटर को भेज देता है, जिससे जवाबी कार्रवाई के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है।

    सवाल: इस पूरे मामले में वैश्विक विश्लेषकों को सबसे ज्यादा हैरान किस बात ने किया है?

    जवाब: विशेषज्ञ इस बात से हैरान हैं कि मिसाइल साइलो की सुरक्षा के लिए बनाया गया यह सपोर्ट नेटवर्क जरूरत से ज्यादा बड़ा और फैला हुआ है। एक प्रमुख अमेरिकी थिंक टैंक के परमाणु सूचना परियोजना निदेशक हैंस क्रिस्टेंसेन ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा, "मैंने अपने पूरे करियर में ऐसा व्यापक और असाधारण सुरक्षा नेटवर्क पहले कभी नहीं देखा।" उन्होंने इसे रक्षा इतिहास का एक अभूतपूर्व प्रयास करार दिया है।

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