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    मेहनत और ज्ञान में कम नहीं हिंदीभाषी पत्रकार, फिर क्यों नहीं मिलता बराबर का सम्मान?

    भाषाई गुलामी की मानसिकता से पीछा छूटे बिना हिंदी पत्रकारिता की चुनौतियां कम नहीं होंगी

    लेखक: निलेश कांठेड़, भीलवाड़ा। देश में आज हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया जा रहा है। हिंदी भाषा के पहले समाचार पत्र उद्न्त मार्तण्ड के प्रकाशन को 200 वर्ष पूर्ण हो गए है। हिंदी में पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों को बधाई संदेश मिल रहे है ओर हिंदी पत्रकारिता की खूबियां बताने वाले आलेख भी अखबारों व सोशल मीडिया पर दिख रहे है पर हकीकत के धरातल पर हालात बिल्कुल अलग है।

    देश के पत्रकारिता जगत में हिंदी में पत्रकारिता करने वालों की तकरीबन वहीं स्थिति है जो हिंदी माध्यम में पढ़ने वालों की होती है। भाषाई गुलामी की मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाने के कारण देश के प्रभावशाली ओर नेतृत्वकर्ता वर्ग की टेबल पर आज भी अंग्रेजीभाषी पत्र पत्रिकाएं ही प्रमुखता से दिखती है ओर अंग्रेजी में पत्रकारिता करने वालों का ‘‘स्टेट्स हाई’’ माना जाता है।

    हिंदी भाषी कई समाचार पत्रों की प्रसार संख्या भले अंग्रेजी भाषी प्रमुख समाचारपत्रों से बहुत अधिक हो पर सत्ता के गलियारों में जो असर अंग्रेजी भाषा के प्रमुख समाचार पत्रों में छपी खबरों का होता है वह हिंदी भाषी समाचारपत्रों का कम ही हो पाता है। देश की रीति-नीति तय करने वाले प्रमुख राजनेता ओर अफसरों की अधिकतर नजर अंग्रेजीभाषी समाचार पत्र ओर चैनलों पर ही टिकी होती है।

    हिंदी भाषा में पत्रकारिता करने वाले मेहनत ओर ज्ञान में किसी भी दृष्टि से अंग्रेजी या अन्य भाषा में पत्रकारिता करने वालों से कम नहीं होते पर अपेक्षाकृत उन्हें वह सम्मान कम ही प्राप्त होता है जिसके वह हकदार होते है। पावरफूल लोगों, सेलिब्रिटी व रसूखदारों के साक्षात्कार करने होते है तो अंग्रेजीभाषी पत्रकारों को प्राथमिकता अब भी मिलती है। हिंदीभाषी पत्रकारिता एवं पत्रकारों की स्थिति तुलनात्मक दृष्टि से कमजोर होने का मुख्य कारण हमारी वह आजादी पूर्व की मानसिकता है जिसमें अंग्रेजी बोलने वालों को ‘‘बड़ा ओर ज्ञानी’’ माना जाता है ओर ऐसा बोलना स्टेट्स सिंबल समझा जाता है।

    आज भी हाईक्लास पार्टियों में अंग्रेजी का बोलबाला बना हुआ है तो हिंदी भाषा में काम करने वालों को वैसा सम्मान मिलना मुश्किल माना जाता है। देश के प्रमुख सम्मान जिन पत्रकारों को प्राप्त हुए उनमें अधिकतर अंग्रेजी भाषा में पत्रकारिता करने वाले है। बात सिर्फ सम्मान ओर रसूख की ही नहीं हिंदी ओर अंग्रेजी भाषा में पत्रकारिता करने वालों की जीवनशैली ओर आर्थिक स्तर में भी भारी अंतर दृष्टिगोचर होता है। हिंदी भाषा में पत्रकारिता करने वाले अधिकतर पत्रकारों के लिए अपनी परिवार का पालनपोषण करते हुए आजीविका चलाना किसी चुनौती से कम नहीं होता है।

    कुछ समाचार पत्रों को छोड़ अधिकतर हिंदी समाचार पत्र पत्रिकाओं में काम करने वाले पत्रकारों व अन्य कर्मचारियों को इतना वेतन नहीं मिलता है कि वह अपने ओर परिवार के सदस्यों के सपने साकार कर सके। डिजिटल ओर सोशल मीडिया के इस युग में हिंदी पत्रकारिता पर निर्भर पत्रकारों के भविष्य के समक्ष गहरा संकट मंडरा रहा है ओर योग्य व प्रतिभावान युवाओं की इस क्षेत्र में कमी साफ दिखाई देने लगी है। हिंदी पत्रकारिता के लेखन स्तर में भी पिछले कुछ वर्षो में गिरावट आई है ओर पीत पत्रकारिता के बढ़ते मामलों ने भी पत्रकारों की गरिमा व साख को चोट पहुंचाई है।

    भाषाई शुद्धता की कमी समाचार पत्रों में साफ दिखती है ओर व्याकरण सम्बन्धी अशुद्धियों की भरमार है। मुझे ज्ञात है कुछ वर्ष पहले शुद्ध हिंदी भाषा सीखने के लिए कुछ हिंदी समाचार पत्रों के उदाहरण दिए जाते थे पर आज प्रूफ रीडर जैसे पद समाप्त कर देने ओर अंग्रेजी में लिखे आलेखों का अनुवाद कर कट पेस्ट करने का जमाना आ जाने से हिंदी भाषा की शुद्धता की बाते भाषणों में सीमित हो गई है।

    हिंदी पत्रकारों की भाषा ही जब शुद्ध नहीं होगी तो वह अपने समाचार पत्र ओर पत्रिका की भाषा की शुद्धता कैसे रख पाएंगे। हम हिंदीभाषी पत्रकारों को समाज में अपना स्तर उंचा उठाना है तो किसी भाषा के पत्रकार से ईर्ष्या करने या दूसरों की लकीर छोटी करने की जरूरत नहीं है। हमे अपने कार्य ओर कर्म से अपनी लकीर इतनी लंबी खींचनी होगी कि भविष्य में कोई भी हिंदी पत्रकारिता ओर पत्रकार की उपेक्षा नहीं कर सके।

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