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    संयुक्त राष्ट्र में भारत की सक्रियता बढ़ी, UNSC सीट के लिए जयशंकर करेंगे अहम मुलाकात

    न्यूयॉर्क। विदेश मंत्री एस. जयशंकर अगले सप्ताह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में वर्ष 2028-29 के कार्यकाल के लिए भारत की अस्थायी सीट हेतु आधिकारिक अभियान का शंखनाद करेंगे। कतर, बहरीन, कुवैत और ओमान की अपनी आधिकारिक यात्रा संपन्न करने के बाद, विदेश मंत्री अमेरिका पहुंच चुके हैं। सोमवार को वे संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम के दौरान भारत की उम्मीदवारी को औपचारिक रूप से पेश करेंगे। इस दौरे के दौरान उनकी मुलाकात संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस से भी प्रस्तावित है।

    भारत-ईयू रणनीतिक वार्ता और कूटनीतिक दौरे

    संयुक्त राष्ट्र में कार्यक्रमों के बाद, विदेश मंत्री 14-15 जुलाई को ब्रुसेल्स का रुख करेंगे। वहां वे तीसरी 'भारत-ईयू व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद' की बैठक में हिस्सा लेंगे। इस दौरान वे यूरोपीय संघ और बेल्जियम के अपने समकक्षों के साथ द्विपक्षीय व्यापारिक संबंधों और वैश्विक चुनौतियों पर चर्चा करेंगे। भारत की यह सक्रियता विभिन्न वैश्विक मंचों पर अपनी उपस्थिति को और अधिक प्रभावी बनाने की रणनीतिक कोशिश का हिस्सा है।

    संयुक्त राष्ट्र में भारत की दावेदारी और चुनौतियां

    भारत ने पिछली बार 2021-22 के कार्यकाल के लिए सुरक्षा परिषद में कार्य किया था। 2028-29 के कार्यकाल के लिए चुनाव अगले साल जून में आयोजित होंगे, जहाँ भारत का मुख्य मुकाबला एशिया-प्रशांत समूह श्रेणी में ताजिकिस्तान के साथ होगा। वर्तमान में दुनिया यूक्रेन युद्ध, गाजा संघर्ष और क्षेत्रीय तनावों जैसी जटिल भू-राजनीतिक स्थितियों से गुजर रही है, ऐसे समय में भारत "#India4UNSC 2028-29 शांति, ग्रह, प्रगति" के संदेश के साथ अपनी दावेदारी पेश कर रहा है।

    सुरक्षा परिषद में सुधार की अनिवार्यता

    भारत वर्षों से सुरक्षा परिषद के विस्तार और उसमें व्यापक सुधारों की वकालत कर रहा है। भारत का स्पष्ट मानना है कि 1945 में स्थापित यह 15 सदस्यीय परिषद समकालीन विश्व की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित नहीं करती और 21वीं सदी के लिए अप्रासंगिक हो चुकी है। भारत ने चेतावनी दी है कि यदि केवल अस्थायी श्रेणी का विस्तार हुआ, तो यह सुधार प्रक्रिया विफल हो जाएगी, क्योंकि स्थायी सदस्यों की निर्णय लेने की शक्ति और संरचना में मौलिक बदलाव नहीं आएगा। भारत का तर्क है कि वह अपने बढ़ते आर्थिक और वैश्विक प्रभाव के अनुरूप परिषद में स्थायी स्थान पाने का पूर्ण अधिकारी है।

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