अहमदाबाद। गुजरात उच्च न्यायालय ने सूरत में लगभग एक सौ मकानों और झुग्गियों को गैर-कानूनी तरीके से गिराए जाने के मामले में एक बेहद कड़ा रुख अपनाया है। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने सूरत के पुलिस आयुक्त एम नागरत्ना की संलिप्तता की आशंका जताई है। माननीय न्यायालय ने पुलिस आयुक्त को स्पष्ट निर्देश जारी करते हुए आगामी 21 जुलाई तक एक आधिकारिक शपथ पत्र के माध्यम से अदालत के समक्ष अपना लिखित जवाब पेश करने का आदेश दिया है।
पुलिस आयुक्त की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम में बिना किसी उचित कानूनी प्रक्रिया के एक साथ इतने सारे आशियानों को जमींदोज किए जाने से प्रशासन की कार्यप्रणाली पर उंगलियां उठ रही हैं। उच्च न्यायालय ने मामले की प्रारंभिक सुनवाई के दौरान मिले तथ्यों के आधार पर पुलिस विभाग के सर्वोच्च अधिकारी की भूमिका को संदिग्ध माना है। अदालत का मानना है कि इतनी बड़ी कार्रवाई बिना उच्च स्तर की अनुमति या सहभागिता के संभव नहीं हो सकती, इसीलिए इस पूरे मामले की तह तक जाने के लिए सीधे आयुक्त से जवाब तलब किया गया है।
पांच विभागीय अधिकारियों पर निलंबन की गाज
इस विवादित मामले के तूल पकड़ने के बाद, पुलिस आयुक्त ने प्रथम दृष्टया लापरवाही बरतने के आरोप में एक कार्यकारी अभियंता सहित कुल पांच विभागीय अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया था। इस सख्त प्रशासनिक कार्रवाई का उद्देश्य मामले को शांत करना था, लेकिन इस निलंबन ने एक नए कानूनी विवाद को जन्म दे दिया है। निलंबित अधिकारियों ने इस कार्रवाई को पूरी तरह से एकतरफा और दुर्भावना से प्रेरित बताया है।
मोबाइल चैट के सबूतों से अदालत में नया मोड़
मामले में उस वक्त एक नया और बेहद रोचक मोड़ आ गया जब निलंबित कार्यकारी अभियंता ने अपने सस्पेंशन के आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दे दी। अभियंता ने अपने बचाव में पुलिस आयुक्त के साथ हुई बातचीत के मोबाइल चैट के स्क्रीनशॉट और डिजिटल साक्ष्य अदालत के सामने प्रस्तुत किए हैं। इन साक्ष्यों के जरिए यह साबित करने का प्रयास किया गया है कि तोड़फोड़ की यह पूरी कार्रवाई आला अधिकारी के सीधे निर्देशों और इच्छा पर की गई थी, जिसके आधार पर निलंबन को रद्द करने की मांग की गई है।
आगामी सुनवाई और शपथ पत्र पर टिकी निगाहें
सूरत से जुड़े इस हाई-प्रोफाइल मामले में अब सभी की नजरें आगामी 21 जुलाई को होने वाली सुनवाई पर टिकी हुई हैं। पुलिस आयुक्त द्वारा दाखिल किए जाने वाले शपथ पत्र और उसमें दिए जाने वाले तर्कों से ही यह साफ हो पाएगा कि इस अवैध तोड़फोड़ के पीछे असली मास्टरमाइंड कौन था। उच्च न्यायालय इन डिजिटल सबूतों और आयुक्त के जवाब की समीक्षा करने के बाद ही दोषियों के खिलाफ आगे की कड़ी दंडात्मक कार्रवाई तय करेगा।


