More
    Homeराज्यसिविल अस्पतालों को मिलेंगे विशेषज्ञ डॉक्टर: पीजी के बाद मेडिकल कॉलेजों की...

    सिविल अस्पतालों को मिलेंगे विशेषज्ञ डॉक्टर: पीजी के बाद मेडिकल कॉलेजों की जगह अब अस्पतालों में होगी तैनाती

    चंडीगढ़ | हरियाणा सरकार ने सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने और मेडिकल कॉलेजों में व्याख्याताओं की कमी को दूर करने के लिए सेवारत डॉक्टरों की पोस्ट ग्रेजुएशन (पीजी) नीति में एक बड़ा प्रशासनिक फेरबदल किया है। इस नए नीतिगत बदलाव के माध्यम से राज्य सरकार चिकित्सा शिक्षा के स्तर को सुधारने के साथ-साथ जिला अस्पतालों की स्वास्थ्य व्यवस्था को भी सुदृढ़ करना चाहती है।

    क्लीनिकल पीजी डॉक्टरों को बॉन्ड से मुक्ति, अस्पतालों में सुधरेंगी सेवाएं

    नई नीति के अनुसार, अब जो सरकारी डॉक्टर क्लीनिकल विषयों में पोस्ट ग्रेजुएशन (पीजी) की पढ़ाई पूरी करेंगे, उन्हें मेडिकल एजुकेशन बॉन्ड की बाध्यता से पूरी तरह मुक्त कर दिया गया है। इसका सीधा मतलब यह है कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद ये विशेषज्ञ डॉक्टर मेडिकल कॉलेजों में रुकने के बजाय सीधे नागरिक अस्पतालों (सिविल हॉस्पिटल्स) में अपनी सेवाएं देंगे। इस फैसले से जिला स्तर के बड़े अस्पतालों में स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की कमी दूर होगी और आम जनता को स्थानीय स्तर पर ही बेहतर इलाज मिल सकेगा। सरकार ने यह राहत हरियाणा सिविल डेंटल सर्विस के डॉक्टरों को भी प्रदान की है।

    नॉन-क्लीनिकल डॉक्टरों के लिए मेडिकल कॉलेजों में पढ़ाना अनिवार्य

    इसके विपरीत, प्री-क्लीनिकल और पैरा-क्लीनिकल जैसे नॉन-क्लीनिकल विषयों (जैसे एनाटॉमी, फिजियोलॉजी, बायोकेमिस्ट्री, फार्माकोलॉजी, पैथोलॉजी और माइक्रोबायोलॉजी) में पीजी करने वाले डॉक्टरों के लिए नियम अलग रखे गए हैं। इन विषयों के डॉक्टरों को अपनी पढ़ाई पूरी होने के बाद तीन वर्षों तक चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान विभाग के अधीन आने वाले मेडिकल कॉलेजों में शिक्षण कार्य करना होगा। यह अनिवार्य अवधि पूरी होने के बाद डॉक्टरों को उसी विभाग में स्थायी रूप से संकाय (फैकल्टी) के तौर पर शामिल होने का विकल्प भी दिया जाएगा। विभाग के उच्च अधिकारियों के मुताबिक, इस कदम का मुख्य उद्देश्य हाल ही में खुले नए सरकारी मेडिकल कॉलेजों के लिए योग्य अध्यापकों की कमी को पूरा करना है।

    पुरानी नीति के प्रावधानों में बदलाव और संतुलन बनाने की कोशिश

    यह नया संशोधन वर्ष दो हजार बाईस में लागू की गई उस नीति में किया गया है, जिसके तहत सेवारत डॉक्टरों को राज्य के मेडिकल कॉलेजों में चालीस प्रतिशत आरक्षित सीटों पर पीजी करने का मौका मिलता था। पुरानी व्यवस्था के तहत हर इन-सर्विस डॉक्टर को पढ़ाई के बाद तीन साल तक मेडिकल या डेंटल कॉलेजों में काम करना जरूरी था, जिससे जिला अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों का भारी अकाल पड़ जाता था। स्वास्थ्य विभाग लंबे समय से इस नियम को बदलने की मांग कर रहा था। सरकार का मानना है कि इस संशोधित नीति से राज्य में चिकित्सा शिक्षा के स्तर और मरीजों को मिलने वाली स्वास्थ्य सुविधाओं के बीच एक सटीक संतुलन स्थापित किया जा सकेगा।

    latest articles

    explore more

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here