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    दुर्गाडी किला विवाद फिर उभरा, बकरीद पर तनाव से Kalyan में माहौल संवेदनशील

    कल्याण: हर साल बकरीद के मौके पर ऐतिहासिक दुर्गाडी किले के आसपास का माहौल बेहद संवेदनशील हो जाता है। प्रशासन द्वारा कानून-व्यवस्था और सुरक्षा को चाक-चौबंद रखने के लिए इस दिन हिंदू श्रद्धालुओं के मंदिर प्रवेश पर पाबंदी लगा दी जाती है। इसी प्रतिबंध के खिलाफ पिछले करीब चालीस वर्षों से एक अनोखा विरोध प्रदर्शन आज भी पूरी शिद्दत के साथ जारी है, जिसे 'घंटानाद आंदोलन' के नाम से जाना जाता है।

    इस विवाद को लेकर दोनों समुदायों की तरफ से अदालत में कानूनी लड़ाई भी लड़ी जा रही है, जिस पर अभी अंतिम फैसला आना बाकी है। इस साल भी बकरीद की नमाज के दौरान यहां भारी गहमा-गहमी देखने को मिली, जहां एक तरफ नमाज के बाद नारेबाजी हुई, तो वहीं दूसरी तरफ हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं ने एकजुट होकर सामूहिक हनुमान चालीसा का पाठ किया।

    छावनी में बदला इलाका, सुरक्षा के कड़े इंतजाम

    तनाव और किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए प्रशासन ने पूरे दुर्गाडी क्षेत्र को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया है। बीजेपी, शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) और विभिन्न दक्षिणपंथी संगठनों द्वारा घोषित आंदोलन को देखते हुए पुलिस विभाग पूरी तरह अलर्ट मोड पर है। कल्याण के लाल चौकी इलाके सहित संवेदनशील पॉइंट पर सुरक्षा बल तैनात हैं। पुलिस ने किले की तरफ जाने वाले तीनों मुख्य रास्तों पर मजबूत बैरिकेडिंग करके उन्हें पूरी तरह सील कर दिया है।

    क्या है दुर्गाडी किला विवाद और इसका इतिहास?

    मुंबई से सटे कल्याण में स्थित ऐतिहासिक दुर्गाडी किले के भीतर एक प्राचीन मंदिर और एक मस्जिद दोनों मौजूद हैं, जो लंबे समय से विवाद का केंद्र रहे हैं। असल में, बकरीद के विशेष अवसर पर सुरक्षा कारणों से हिंदुओं के मंदिर में आने पर रोक लगाने की व्यवस्था शुरू की गई थी, जिसका हिंदू संगठनों द्वारा लगातार विरोध किया जाता रहा है।

    आनंद दिघे और 'घंटानाद आंदोलन' की शुरुआत

    इस विरोध प्रदर्शन की नींव साल 1986 में कद्दावर शिवसेना नेता आनंद दिघे (जिन्हें मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे का राजनीतिक गुरु माना जाता है) ने रखी थी। उन्होंने इस पाबंदी को सीधे चुनौती देते हुए किले के भीतर स्थित मंदिर से 'घंटानाद आंदोलन' का बिगुल फूंका था। दिघे का स्पष्ट दावा था कि यह स्थान मूल रूप से हिंदुओं की आस्था का केंद्र है और उनके अधिकारों को दबाया नहीं जा सकता।

    चार दशकों से जारी है राजनीतिक और सामाजिक टकराव

    साल 1986 के उस ऐतिहासिक घटनाक्रम के बाद से ही कल्याण का यह किला पूरे महाराष्ट्र की राजनीति और सामाजिक विमर्श का एक बड़ा केंद्र बन गया। आनंद दिघे द्वारा शुरू की गई यह परंपरा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है और हर साल इस मौके पर विभिन्न राजनीतिक दल और स्थानीय संगठन किले के बाहर पहुंचकर घंटानाद के जरिए अपना विरोध दर्ज कराते हैं।

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