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    सरकारी इंतजार छोड़ ग्रामीणों ने उठाया बीड़ा, चंदा जुटाकर बना रहे स्कूल

    डिंडोरी (मध्य प्रदेश):मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल डिंडोरी जिले के समनापुर विकासखंड के अंतर्गत आने वाला शिकारीटोला गांव इन दिनों अपनी एक अनूठी और प्रेरणादायक पहल को लेकर पूरे इलाके में चर्चा का विषय बना हुआ है। यहाँ के ग्रामीणों ने बुनियादी सुविधाओं के लिए सरकारी व्यवस्था का लंबा इंतजार छोड़ते हुए अपने बच्चों के सुनहरे भविष्य की जिम्मेदारी अब पूरी तरह अपने कंधों पर उठा ली है। हर घर से 500 रुपये की आर्थिक मदद (चंदा) जुटाने और आपसी श्रमदान के जरिए गांव के लोग मिलकर खुद ही एक नए स्कूल भवन का निर्माण कर रहे हैं। यह कहानी सिर्फ एक पाठशाला के निर्माण की नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक उदासीनता के खिलाफ ग्रामीणों के मजबूत संकल्प और आत्मनिर्भरता की एक जीती-जागती मिसाल है।

    जर्जर भवन टूटने के बाद मकान में पढ़ाई की मजबूरी

    समनापुर विकासखंड के शिकारीटोला गांव की शासकीय प्राथमिक शाला का पुराना भवन समय के साथ पूरी तरह जर्जर और खंडहर में तब्दील हो चुका था। नौनिहालों के सिर पर मंडराते खतरे को देखते हुए प्रशासन ने कुछ समय पहले उस पुराने भवन को जमींदोज तो कर दिया, लेकिन उसके स्थान पर नए भवन की स्वीकृति या निर्माण कार्य शुरू नहीं कराया गया। इस प्रशासनिक ढिलाई के कारण पिछले कुछ वर्षों से गांव के ही एक नागरिक के छोटे से निजी मकान में स्कूल का संचालन किया जा रहा है, जहां वर्तमान में 52 मासूम बच्चे बेहद तंग जगह में बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं।

    आश्वासनों से थककर ग्रामीणों ने खुद उठाया फावड़ा

    स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने अपने बच्चों की इस समस्या को लेकर कई बार प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों तक गुहार लगाई और नए स्कूल भवन के निर्माण की मांग की। हालांकि, हर बार उन्हें केवल खोखले आश्वासन ही हाथ लगे और जमीनी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। आखिरकार, व्यवस्था की इस घोर लापरवाही और लेत-लतीफी से तंग आकर गांव वालों ने सामूहिक रूप से यह बड़ा फैसला लिया कि वे अब अपने बच्चों की शिक्षा और उनके भविष्य को व्यवस्था की भेंट नहीं चढ़ने देंगे। इसके बाद पूरे गांव ने एकजुट होकर खुद ही फावड़ा और तसला उठा लिया।

    हर घर से सहयोग और सामूहिक श्रमदान की मिसाल

    बच्चों को एक सुरक्षित और बेहतर शैक्षणिक माहौल देने की इस मुहिम में गांव का हर एक व्यक्ति बढ़-चढ़कर अपना योगदान दे रहा है। अपनी सीमित आर्थिक स्थिति के बावजूद बच्चों के भविष्य को सर्वोपरि रखते हुए गांव के प्रत्येक परिवार ने स्वेच्छा से 500-500 रुपये की राशि एकत्रित की है। इस राशि से निर्माण सामग्री खरीदी जा रही है, जबकि मजदूरी के खर्च को बचाने के लिए गांव की महिलाएं, युवा और बुजुर्ग सभी मिलकर सुबह से शाम तक निर्माण कार्य में हाथ बंटा रहे हैं। ग्रामीणों का केवल एक ही साझा लक्ष्य है कि बारिश और धूप से बचकर उनके बच्चे एक सुरक्षित छत के नीचे अपनी पढ़ाई पूरी कर सकें।

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