चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय ने चेक बाउंस से जुड़े मुकदमों को लेकर एक बेहद नजीर पेश करने वाला और बड़ा फैसला दिया है। माननीय अदालत ने दो टूक शब्दों में स्पष्ट किया है कि कोई भी आरोपी महज यह बहाना बनाकर अपनी कानूनी देनदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता कि विवादित चेक को उसने खाली (ब्लैंक) या सिर्फ सुरक्षा (सिक्योरिटी) के तौर पर दिया था। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में साफ कहा कि अगर आरोपी व्यक्ति चेक के ऊपर किए गए अपने हस्ताक्षरों की सत्यता को स्वीकार कर लेता है, तो कानूनन पहली नजर में यही माना जाएगा कि वह चेक किसी वैध कर्ज के निपटारे या भुगतान के उद्देश्य से ही सौंपा गया था।
हस्ताक्षर की स्वीकार्यता और आरोपी पर सबूत का जिम्मा
अदालत की एकल पीठ ने इस मामले की सुनवाई के दौरान बेहद महत्वपूर्ण विधिक टिप्पणी करते हुए कहा कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट (एनआई एक्ट) की धारा 118 और 139 के प्रावधानों के तहत शुरुआती कानूनी झुकाव और अनुमान हमेशा शिकायतकर्ता के पक्ष में काम करता है। ऐसी स्थिति में, कोर्ट के सामने खुद को बेगुनाह साबित करने की पूरी जिम्मेदारी (ओनस ऑफ प्रूफ) स्वयं आरोपी के कंधों पर आ जाती है। आरोपी को साधारण बयानों के बजाय ठोस और अकाट्य दस्तावेजों के माध्यम से अदालत में यह प्रमाणित करना होगा कि वास्तव में उसकी कोई वित्तीय देनदारी बनती ही नहीं थी और उसके द्वारा दिए गए चेक का गलत तरीके से इस्तेमाल किया गया है।
लुधियाना का मामला और कोरे चेक पर कोर्ट का रुख
दरअसल, लुधियाना से जुड़े एक मामले की अपील पर सुनवाई के दौरान एक आरोपी ने जिला अदालत के फैसले के खिलाफ यह दलील पेश की थी कि उसने संबंधित चेक महज एक गारंटी या सुरक्षा के रूप में दिया था, जिसका बाद में दुरुपयोग किया गया। हालांकि, उच्च न्यायालय ने मामले के तथ्यों को देखने के बाद पाया कि आरोपी अपने इस दावे को साबित करने के लिए कोई भी भरोसेमंद साक्ष्य पेश करने में पूरी तरह नाकाम रहा। जस्टिस ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से साइन किया हुआ कोरा चेक किसी अन्य को सौंपता है, तो कानून की नजर में यह माना जाता है कि उसने सामने वाले व्यक्ति को चेक में राशि और तिथि जैसी जरूरी जानकारियां भरने का पूरा अधिकार दे दिया था।
सख्त रुख और कानून का मुख्य उद्देश्य
उच्च न्यायालय ने इन्हीं कानूनी तर्कों को आधार बनाते हुए आरोपी की पुनर्विचार याचिका को सिरे से खारिज कर दिया और निचली अदालतों द्वारा उसे दोषी ठहराए जाने के फैसले में किसी भी तरह का हस्तक्षेप करने से साफ मना कर दिया। अदालत ने अपने निर्णय में रेखांकित किया कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट का असल मकसद देश की व्यापारिक व्यवस्था और बैंकिंग लेन-देन में चेक की विश्वसनीयता और साख को हर हाल में बरकरार रखना है। इसलिए, बिना किसी मजबूत और प्रामाणिक आधार के केवल 'सिक्योरिटी चेक' होने की बात कहकर मुकदमों से बच निकलने की इजाजत नहीं दी जा सकती।


