नई दिल्ली: भारत की समुद्री सुरक्षा और नौसेना की ताकत को बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार ने एक बहुत बड़ा कदम उठाया है। वित्त मंत्रालय ने लगभग 70 हजार करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत वाले 'प्रोजेक्ट-75I' (P-75I) को अपनी मंजूरी दे दी है। इस बेहद महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट के तहत देश के भीतर ही छह सबसे आधुनिक और शक्तिशाली पारंपरिक (कन्वेंशनल) पनडुब्बियों का निर्माण किया जाएगा। वित्त मंत्रालय से हरी झंडी मिलने के बाद अब इस प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली 'कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी' (CCS) के पास भेजा जाएगा, जहां से पास होते ही इस ऐतिहासिक रक्षा सौदे पर दस्तखत कर दिए जाएंगे।
भारत की 'मझगांव डॉक' और जर्मनी की कंपनी मिलकर बनाएंगी पनडुब्बी
रक्षा क्षेत्र में 'मेक इन इंडिया' और आत्मनिर्भर भारत अभियान को रफ्तार देने वाले इस महाप्रोजेक्ट को मुंबई की सरकारी कंपनी 'मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड' (MDL) और जर्मनी की मशहूर कंपनी 'थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स' (tkMS) मिलकर पूरा करेंगी। इस रेस में उन्होंने लार्सन एंड टुब्रो और स्पेन की कंपनी के साझा प्रस्ताव को पीछे छोड़कर यह बड़ा कॉन्ट्रैक्ट हासिल किया है। खास बात यह है कि यह समझौता नए नौसेना प्रमुख एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन के कार्यकाल में साइन होगा, जो 31 मई को मौजूदा नेवी चीफ एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी की जगह कार्यभार संभालेंगे।
दुश्मन की नजरों से बचकर हफ्तों पानी के नीचे रहेगी तैनात
इस प्रोजेक्ट के तहत तैयार होने वाली सभी छह पनडुब्बियां जर्मनी की 'एचडीडब्ल्यू क्लास-214' डिजाइन पर आधारित होंगी। इन पनडुब्बियों की सबसे बड़ी खासियत यह होगी कि इनमें 'एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन' (AIP) तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। इस आधुनिक तकनीक की मदद से पनडुब्बियां बिना सतह पर आए बहुत लंबे समय तक समुद्र की गहराइयों में छिपी रह सकती हैं, जिससे दुश्मन देश के रडार और निगरानी तंत्र के लिए इन्हें ढूंढ पाना नामुमकिन हो जाता है। रक्षा सौदे पर अंतिम मुहर लगने के ठीक 7 साल बाद पहली पनडुब्बी भारतीय नौसेना को सौंप दी जाएगी और इसके बाद हर साल एक-एक कर बाकी की पांचों पनडुब्बियां भी बेड़े में शामिल होती जाएंगी।
भारतीय पुर्जों और स्वदेशी तकनीक को मिलेगी प्राथमिकता
इस बड़ी परियोजना में भारत को पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाने और तकनीक के हस्तांतरण (ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी) पर विशेष ध्यान दिया गया है। नियमों के मुताबिक, जब पहली पनडुब्बी बनेगी तो उसमें कम से कम 45 फीसदी भारतीय (स्वदेशी) सामान और पुर्जों का इस्तेमाल करना जरूरी होगा, जबकि छठी पनडुब्बी के निर्माण तक इस स्वदेशी हिस्सेदारी को बढ़ाकर 60 फीसदी तक ले जाया जाएगा। जर्मन कंपनी भारत को पनडुब्बी की पूरी डिजाइन और बनाने की तकनीक भी देगी, जिससे देश के रक्षा उद्योग को भविष्य में बहुत फायदा होगा। इससे पहले भी मझगांव डॉक ने फ्रांस के सहयोग से छह 'कलवरी क्लास' (स्कॉर्पीन) पनडुब्बियों का सफल निर्माण किया था, जिनमें से आखिरी पनडुब्बी 'आईएनएस वाग्शीर' जनवरी 2025 में नौसेना का हिस्सा बनी थी।
परमाणु पनडुब्बियों से भी भारत ने बढ़ाई अपनी ताकत
पारंपरिक पनडुब्बियों के साथ-साथ भारत समुद्र से परमाणु हमला करने की अपनी क्षमता (न्यूक्लियर ट्रायड) को भी लगातार अभेद्य बना रहा है। हाल ही में, अप्रैल 2026 में भारतीय नौसेना ने अपनी तीसरी परमाणु ऊर्जा से चलने वाली और बैलिस्टिक मिसाइल से लैस पनडुब्बी 'आईएनएस अरिदमन' को विशाखापत्तनम में एक गुप्त कार्यक्रम के दौरान बेड़े में शामिल किया है। इससे पहले 'आईएनएस अरिहंत' और 'आईएनएस अरिघात' जैसी परमाणु पनडुब्बियां पहले से ही देश की समुद्री सीमाओं की रक्षा कर रही हैं। इन घातक हथियारों की बदौलत भारत अब दुनिया के उन गिने-चुने ताकतवर देशों की कतार में मजबूती से खड़ा है, जो जरूरत पड़ने पर जल, थल और नभ तीनों जगहों से परमाणु हथियार दाग सकते हैं।


