जबलपुर। मध्य प्रदेश में 'स्वामित्व योजना' के तहत निजी संपत्तियों के अभिलेख और स्वामित्व दस्तावेज तैयार करने के लिए 22 हजार पटवारियों को कार्यकारी अधिकारी बनाए जाने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है। राज्य सरकार के 13 अगस्त 2026 के आदेश को चुनौती देने वाली प्रांतीय पटवारी संघ की याचिका को उच्च न्यायालय से वापस ले लिया गया है। न्यायमूर्ति मनिंदर सिंह भट्टी की एकलपीठ ने याचिका वापस लिए जाने के अनुरोध को स्वीकार करते हुए इसे खारिज कर दिया। इस आदेश के बाद अब प्रदेश के करीब 68 लाख लोगों की संपत्तियों के स्वामित्व संबंधी दस्तावेज तैयार करने की प्रक्रिया में तेजी आ सकेगी।
सरकार की आपत्ति पर संघ ने वापस ली याचिका
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की तरफ से अतिरिक्त महाधिवक्ता हरप्रीत रूपराह और शासकीय अधिवक्ता प्रभांशु शुक्ल उपस्थित हुए। सुनवाई में अतिरिक्त महाधिवक्ता ने याचिका की विचारणीयता पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने तर्क दिया कि सरकार ने स्वामित्व योजना के तहत यह जिम्मेदारी मैदानी स्तर पर कार्यरत पटवारियों को व्यक्तिगत रूप से सौंपी है, ऐसे में प्रांतीय पटवारी संघ को अपने सदस्यों की ओर से इस प्रशासनिक आदेश को चुनौती देने का कोई विधिक अधिकार नहीं है। सरकार की इस आपत्ति के बाद याचिकाकर्ता संघ ने न्यायालय से याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।
क्या था विवाद और 13 अगस्त का आदेश?
केंद्र सरकार की महत्वकांक्षी 'स्वामित्व योजना' के अंतर्गत राज्य सरकार ने 13 अगस्त 2026 को एक आदेश जारी किया था। इस आदेश के जरिए मैदानी स्तर पर काम कर रहे पटवारियों को कार्यकारी अधिकारी नामित किया गया था, ताकि वे निजी संपत्तियों के अभिलेख और ओनरशिप डॉक्यूमेंट्स तैयार कर सकें। इसी आदेश की वैधानिकता और पटवारियों को सौंपी गई अतिरिक्त जिम्मेदारियों को चुनौती देते हुए प्रांतीय पटवारी संघ ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
याचिका में उठाए गए प्रमुख सवाल और आशंकाएं
पटवारी संघ की ओर से अपनी याचिका में निम्नलिखित मुख्य बिंदु रखे गए थे:
वैधानिक प्रावधानों का सवाल: संघ का तर्क था कि पटवारी राजस्व प्रशासन के मैदानी कर्मचारी हैं और संपत्ति के अधिकार से जुड़े महत्वपूर्ण कार्य सामान्यतः सक्षम राजस्व अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
कानूनी विवादों की आशंका: याचिका में अंदेशा जताया गया था कि स्वामित्व योजना के तहत अभिलेख तैयार करने के दौरान भविष्य में मालिकाना हक, सीमांकन और बंटवारे जैसे गंभीर विवाद खड़े हो सकते हैं, जिससे पटवारी व्यक्तिगत रूप से मुकदमों में उलझ सकते हैं।
प्रक्रिया पर आपत्ति: संघ ने आदेश की प्रति मिलने की प्रक्रिया और समय-सीमा पर भी सवाल उठाते हुए अपनी आपत्तियां दर्ज कराई थीं।
बहरहाल, याचिका खारिज होने के बाद अब शासन स्तर पर स्वामित्व योजना के क्रियान्वयन में आ रही प्रशासनिक बाधा दूर हो गई है।


