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    पाकिस्तान के खर्चों पर फिर उठे सवाल, आर्थिक प्राथमिकताओं को लेकर बहस

    वाशिंगटन: गंभीर आर्थिक संकट, आसमान छूती महंगाई और रिकॉर्ड बेरोजगारी से बेहाल पाकिस्तान अब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी मटियामेट हो चुकी छवि को बचाने के लिए विदेशी लॉबिस्ट्स और प्रेशर ग्रुप्स (दबाव समूहों) पर करोड़ों रुपये फूंक रहा है। बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में मानवाधिकारों के खुलेआम उल्लंघन, अल्पसंख्यकों पर जुल्म और सेना की तानाशाही को लेकर इस्लामाबाद लगातार वैश्विक स्तर पर अलग-थलग पड़ रहा है। अपनी इस दोहरी नीति के तहत, पाकिस्तान घरेलू मोर्चे पर जनता को बुनियादी सुविधाएं देने में भले ही नाकाम रहा हो, लेकिन विदेशों में पीआर (पब्लिक रिलेशंस) चमकाने के लिए सरकारी खजाना खोल चुका है।

    ट्रंप प्रशासन के दौर में पाकिस्तान की छटपटाहट

    पाकिस्तान लंबे समय से खुद को दुनिया के सामने एक लोकतांत्रिक और मजबूत देश के रूप में पेश करने का ढोंग करता रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाले प्रशासन के साथ संबंधों को सुधारने के लिए भी इस्लामाबाद लगातार प्रोपेगैंडा फैला रहा है। हालांकि, जमीनी हकीकत इसके उलट है। सोशल मीडिया के इस दौर में बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा से आ रही दमन की तस्वीरें दुनिया के सामने आ चुकी हैं, जिससे घबराकर पाकिस्तान अब अमेरिकी लॉबिंग कंपनियों के सहारे नैरेटिव बदलने की कोशिश कर रहा है।

    हर महीने $50,000 का खर्च: आखिर अमेरिका में कौन संभाल रहा है कमान?

    "हालिया कूटनीतिक दस्तावेजों के अनुसार, पाकिस्तान ने अमेरिका की दिग्गज लॉबिंग फर्म ‘एर्विन ग्रेव्स स्ट्रेटजी ग्रुप एलएलसी’ के साथ एक बड़ा करार किया है। इसके लिए पाकिस्तान इस फर्म को हर महीने 50 हजार अमेरिकी डॉलर (लगभग 42 लाख रुपये) का भुगतान करेगा। इस फर्म का मुख्य काम वाशिंगटन में अमेरिकी नीति निर्माताओं, सांसदों और बड़े नेताओं के बीच पाकिस्तान के पक्ष में माहौल तैयार करना और वहां गोलमेज सम्मेलनों व सेमिनारों के जरिए पाकिस्तान के मानवाधिकारों के काले रिकॉर्ड पर परदा डालना है।"

    अफगानिस्तान के बहाने खुद को विक्टिम दिखाने की चाल

    पाकिस्तान अब वैश्विक मंचों पर अफगानिस्तान के मुद्दे को भुनाने की फिराक में है। वह लगातार यह नैरेटिव सेट करने में जुटा है कि अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल आतंकवादी संगठन 'तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान' (TTP) कर रहा है, जिससे खुद पाकिस्तान पीड़ित है। हालांकि, अफगान तालिबान इन आरोपों को सिरे से खारिज करता रहा है। अब अमेरिकी लॉबिंग फर्मों को यह टास्क दिया गया है कि वे पश्चिमी देशों को समझाएं कि अफगानिस्तान ही पूरे क्षेत्र में अस्थिरता की जड़ है, ताकि पाकिस्तान को मिलने वाली मदद जारी रह सके।

    UN की रिपोर्ट ने उतारी इज्जत

    हाल ही में संयुक्त राष्ट्र (UN) मानवाधिकार समिति की एक बेहद तल्ख रिपोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की पोल खोल दी थी। इस रिपोर्ट में पाकिस्तान के भीतर:

    • हिंदू और ईसाई लड़कियों के जबरन अपहरण और धर्म परिवर्तन पर गहरी चिंता जताई गई थी।

    • शिया, अहमदी, ईसाई, हिंदू और सिख समुदायों पर लगातार हो रहे जानलेवा हमलों को रोकने में वहां की सरकार को पूरी तरह नाकाम बताया गया था।

    विशेषज्ञों का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र की इस फटकार के बाद ही पाकिस्तान ने लॉबिंग फर्मों को सक्रिय किया है ताकि अंतरराष्ट्रीय मीडिया में पाकिस्तान के समर्थन में प्रायोजित (Paid) लेख छपवाए जा सकें।

    आर्मी चीफ आसिम मुनीर पर चौतरफा दबाव

    जानकारों के मुताबिक, पाकिस्तान इस समय पूरी तरह से सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के शिकंजे में है। लेकिन टीटीपी और बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) द्वारा पाकिस्तानी फौज पर किए जा रहे ताबड़तोड़ हमलों ने देश की सुरक्षा व्यवस्था को घुटनों पर ला दिया है। 'ऑपरेशन सिंदूर' के बेअसर साबित होने के बाद आसिम मुनीर की साख को गहरा धक्का लगा है।

    आलोचकों का साफ कहना है कि जहां एक तरफ आम पाकिस्तानी नागरिक दो वक्त की रोटी के लिए तरस रहा है, वहीं जनरल मुनीर और शहबाज सरकार करोड़ों रुपये सिर्फ अपनी झूठी साख बचाने वाले विदेशी अभियानों पर बर्बाद कर रहे हैं।

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