कोटा। देश के सबसे बड़े कोचिंग हब में जब लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने युवाओं के सामने यह यक्ष प्रश्न रखा कि आखिर देश की युवा आबादी चंद गिने-चुने करियर विकल्पों के पीछे ही क्यों भाग रही है, तो वहां उपस्थित 5000 से अधिक छात्र-छात्राओं के बीच गहरा सन्नाटा छा गया। 'छात्रों की गूंज' नामक विशेष कार्यक्रम में हिस्सा लेने पहुंचे कांग्रेस नेता ने युवाओं को पारंपरिक ढर्रे— जैसे इंजीनियरिंग, मेडिकल, वकालत, सिविल सर्विसेज या सेना की तैयारी की भेड़चाल से मुक्त होने की एक बेहद विचारणीय और चौंकाने वाली नसीहत दी। इस दौरान उन्होंने देश में रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के संघर्ष को रेखांकित करते हुए आंकड़ों के माध्यम से इस अंधी दौड़ के पीछे छिपे गहरे सामाजिक और आर्थिक दर्द को उजागर किया।
चयन नहीं, युवाओं के सपनों को कुचलने वाला रिजेक्शन सिस्टम
राहुल गांधी ने वर्तमान शैक्षणिक ढांचे पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि जिसे आज देश में 'शिक्षा व्यवस्था' का नाम दिया जाता है, वह वास्तव में युवाओं को अवसर प्रदान करने के बजाय उन्हें तंत्र से बाहर धकेलने का जरिया बन चुकी है। उन्होंने इसे एक ऐसी मशीन करार दिया जो युवाओं की आकांक्षाओं को बेरहमी से कुचल रही है और जिसके दुष्परिणामस्वरूप समाज में केवल मानसिक तनाव, अवसाद और दुखद घटनाएं सामने आ रही हैं। उनका तर्क था कि बेहद सीमित सीटों के मुकाबले करोड़ों की संख्या में युवाओं को इस अंतहीन प्रतियोगिता में झोंक दिया जाता है, जिसके कारण अंततः अधिकांश छात्रों के हिस्से में केवल असफलता और घोर निराशा ही हाथ लगती है।
कोचिंग के नाम पर परिवारों की गाढ़ी कमाई की देशव्यापी लूट
इस अंधी दौड़ के आर्थिक पक्ष का विश्लेषण करते हुए विपक्ष के नेता ने देश के सामने कुछ ऐसे चौंकाने वाले वित्तीय आंकड़े रखे, जिन्होंने सभी को झकझोर कर रख दिया। उन्होंने बताया कि इस चूहा-दौड़ के कारण देश के गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ रहा है। अकेले नीट (NEET) परीक्षा का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि हर साल इसमें बैठने वाले करीब 22 लाख छात्रों के परिजन कोचिंग, आवास और अध्ययन सामग्री पर सालाना लगभग 1.32 लाख करोड़ रुपये खर्च कर देते हैं, जो कि केंद्र सरकार के कुल शिक्षा बजट के समतुल्य है। यदि इसमें यूपीएससी, जेईई, एसएससी और रेलवे जैसी अन्य बड़ी परीक्षाओं की तैयारी का खर्च भी समाहित कर लिया जाए, तो यह राशि बढ़कर सालाना 3.5 लाख करोड़ रुपये हो जाती है, जो देश के पांच प्रमुख मंत्रालयों के कुल वित्तीय बजट के बराबर है। इस पूरे तंत्र में सारा जोखिम सिर्फ छात्र का होता है और अंत में व्यवस्था उनके लिए अपने दरवाजे बंद कर लेती है।
मानसिक तनाव का चक्रव्यूह और असली हुनर को पहचानने की अपील
समारोह के दौरान जब उन्होंने विद्यार्थियों से सीधा संवाद स्थापित किया, तो एक नीट परीक्षार्थी ने साझा किया कि कला और नृत्य में रुचि होने के बावजूद पारिवारिक व सामाजिक दबाव के कारण वह चिकित्सा क्षेत्र की तैयारी करने को विवश है। इस पर चिंता व्यक्त करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि समाज बच्चों को उनकी वास्तविक प्रतिभा के अनुसार सपने देखने की स्वतंत्रता ही नहीं दे रहा है, जिसका परिणाम यह है कि आज छात्र अपनी योग्यता से ज्यादा पेपर लीक जैसी अनियमितताओं से खौफजदा रहते हैं और यही मानसिक दबाव उन्हें आत्मघाती कदम उठाने की ओर धकेलता है। उन्होंने युवाओं का आह्वान किया कि वे इस भेड़चाल को त्यागकर अपने भीतर छिपे वास्तविक हुनर को पहचानें क्योंकि दुनिया में असीमित करियर विकल्प मौजूद हैं। उन्होंने युवाओं में जोश भरते हुए कहा कि यदि मौजूदा व्यवस्था सपनों को बोझ बना रही है, तो युवाओं को जागना होगा, सवाल करने होंगे और इस पूरे ढर्रे को बदलने के लिए आगे आना होगा।


