रायपुर: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के सीमावर्ती डुमरतालाब ग्रामीण अंचल से सरकारी और सार्वजनिक उपयोग की भूमि को खुर्द-बुर्द करने का एक बेहद ही गंभीर और चौंकाने वाला प्रशासनिक भ्रष्टाचार का मामला प्रकाश में आया है। यहाँ करोड़ों रुपये मूल्य की बहुकीमती रेलवे की स्वामित्त्व वाली भूमि पर भू-माफियाओं और राजस्व विभाग के कर्मचारियों की कथित साठगांठ से अवैध रूप से कब्जा करने, फर्जी तरीके से बंटांकन करने, नामांतरण (म्युटेशन) और धड़ल्ले से निजी रजिस्ट्री कर जमीन को बेचने का एक बड़ा सिंडिकेट सामने आया है।
इस पूरे महाघपले को लेकर एक जागरूक नागरिक ने पुख्ता दस्तावेजों के साथ रायपुर जिला कलेक्टर के समक्ष एक औपचारिक शिकायत पत्र सौंपा है। आवेदन में मांग की गई है कि रेलवे की इस संपत्ति को निजी हाथों में सौंपने वाले जिम्मेदार अफसरों, क्रेता और विक्रेताओं के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला दर्ज कर पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष एवं उच्च स्तरीय जांच कराई जाए।
वर्ष 1955 से सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज थी 'रेलवे सड़क'; बी-1 फॉर्म ने खोली सांठगांठ की पूरी पोल
रायपुर: शिकायतकर्ता बलबीर सिंह द्वारा कलेक्टर कार्यालय को सौंपे गए दस्तावेजों और ऐतिहासिक राजस्व अभिलेखों के अनुसार, यह पूरी जमीन पूरी तरह से सरकारी और सार्वजनिक उपयोग के लिए आरक्षित थी:
खसरा नंबर 43/2 का सच: शिकायत के मुताबिक, विवादित भूमि का खसरा क्रमांक 43/2 है, जो पूर्व के सभी पुराने सरकारी राजस्व रिकॉर्ड्स में स्पष्ट रूप से रेलवे मार्ग यानी 'रेलवे सड़क' के हिस्से के रूप में दर्ज है।
दशकों पुराने रिकॉर्ड: अविभाजित मध्य प्रदेश के समय यानी वर्ष 1955 के बाद से उपलब्ध सभी शासकीय अभिलेखों और वर्ष 1977 के आधिकारिक बंदोबस्त दस्तावेजों में भी इस पूरी भूमि का मालिकाना हक खसरा क्रमांक 30/4 के तहत रेलवे विभाग के अधीन सड़क के रूप में दर्शाया गया है। वर्तमान में जो डिजिटल बी-1 (किस्तबंदी खतौनी) रिकॉर्ड मौजूद है, उसमें भी स्पष्ट तौर पर इस जमीन की प्रकृति 'रेलवे सड़क भूमि' लिखी हुई है, जिसके कारण इसे किसी भी परिस्थिति में बेचा या ट्रांसफर नहीं किया जा सकता था।
साल 2000-01 में हुआ नियमों को ताक पर रखकर नया बंटांकन; शिकायतकर्ता ने उठाए गंभीर कानूनी सवाल
रायपुर: इस पूरे भू-घोटाले का खेल छत्तीसगढ़ राज्य बनने के ठीक बाद शुरू हुआ, जिसे लेकर अब राजस्व विभाग के कार्यप्रणाली पर गंभीर उंगलियां उठ रही हैं:
नया खसरा तैयार करने की साजिश: शिकायत में यह आरोप लगाया गया है कि वर्ष 2000-2001 के दौरान तत्कालीन राजस्व अधिकारियों ने नियमों को पूरी तरह से ताक पर रखकर मुख्य खसरा क्रमांक 43/1 में से जानबूझकर छेड़छाड़ की और इस जादुई खेल के जरिए 43/2 का एक बिल्कुल नया बंटांकन (टुकड़ा) तैयार कर दिया।
अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध: बंटांकन करने के तुरंत बाद भू-माफियाओं के पक्ष में इस विवादित सरकारी जमीन का नामांतरण भी कर दिया गया और उप-पंजीयक कार्यालय से इसकी अवैध रजिस्ट्री भी संपादित करा दी गई। शिकायतकर्ता ने प्रशासन के सामने यह तीखा कानूनी सवाल खड़ा किया है कि यदि यह जमीन मूल रूप से केंद्र सरकार के अधीन भारतीय रेलवे की थी, तो किस नियम के तहत और किस सक्षम उच्च अधिकारी की लिखित अनुमति से इसे एक निजी व्यक्ति की मिल्कियत में तब्दील कर दिया गया?
रेलवे की जमीन पर बेधड़क चल रही है खुदाई और बिक्री; कॉलोनाइजर और निजी संस्थाओं के नाम आए सामने
रायपुर: शिकायत पत्र में इस बात का भी विस्तार से उल्लेख किया गया है कि वर्तमान समय में उस विवादित सरकारी भूमि पर जमीनी हालात क्या हैं:
अवैध निर्माण और प्लॉटिंग: दावा किया गया है कि भू-माफिया और कुछ प्रभावशाली लोग वर्तमान में उस जमीन पर पूरी तरह से काबिज हो चुके हैं। वहां बड़े पैमाने पर जेसीबी मशीनों से अवैध खुदाई कराई जा रही है और प्लाट काटकर उसे आम लोगों को ऊंचे दामों पर बेचने की अवैध व्यावसायिक गतिविधियां संचालित की जा रही हैं।
निजी संस्थाओं का नाम: इस पूरे खेल में शहर के कुछ चुनिंदा रियल एस्टेट कारोबारियों और एक निजी संस्था का नाम भी प्रमुखता से लिया गया है। हालांकि, जिला प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि जब तक राजस्व और रेलवे की संयुक्त टीम सीमांकन नहीं कर लेती, तब तक इन आरोपों पर आधिकारिक तौर पर अंतिम मुहर नहीं लगाई जा सकती। संबंधित आरोपियों की तरफ से भी अभी तक इस पर कोई कानूनी पक्ष सामने नहीं आया है।
कलेक्टर से इन 5 मुख्य बिंदुओं पर की गई है त्वरित कड़ी जांच और सख्त एक्शन की मांग
रायपुर: इस बड़े भूमि घोटाले के खुलासे के बाद शिकायतकर्ता ने रायपुर कलेक्टर से त्वरित न्याय और सरकारी संपत्ति को बचाने के लिए निम्नलिखित 5 महत्वपूर्ण बिंदुओं पर उच्च स्तरीय जांच की मांग की है:
ऐतिहासिक रिकॉर्ड की स्क्रूटनी: वर्ष 1955 से लेकर आज तक के सभी मूल राजस्व अभिलेखों, सरकारी नक्शों, खसरा पांचसाला और नामांतरण फाइलों की भौतिक जांच कराई जाए।
फर्जी बंटांकन की समीक्षा: वर्ष 2000-01 में किए गए खसरा विभाजन (बंटांकन) के वैधानिक और कानूनी आधार की जांच हो कि वह किस आदेश के तहत किया गया।
लाइसेंस और रजिस्ट्री निरस्तीकरण: फर्जी नामांतरण और रजिस्ट्री की पूरी प्रक्रिया की न्यायिक समीक्षा कर इस घपले में शामिल तत्कालीन पटवारी, आरआई और तहसीलदार की जवाबदेही तय कर उन पर एफआईआर दर्ज की जाए।
काम रुकवाने के निर्देश: मौके पर चल रही अवैध खुदाई, कब्जा और भूखंडों की बिक्री पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई जाए।
शासकीय प्रविष्टि की बहाली: यदि तकनीकी जांच में यह भूमि रेलवे की साबित होती है, तो कंप्यूटर रिकॉर्ड में दर्ज सभी अवैध निजी प्रविष्टियों और नामों को तुरंत निरस्त कर इसे पुनः 'शासकीय रेलवे सड़क' के रूप में दर्ज किया जाए।
करोड़ों की सरकारी संपत्ति का मामला; रायपुर जिला प्रशासन की टीम जांच में जुटी
रायपुर: सार्वजनिक हित और देश की सबसे बड़ी परिवहन व्यवस्था यानी भारतीय रेलवे की संपत्ति से जुड़े होने के कारण यह मामला बेहद गंभीर और संवेदनशील श्रेणी में आ गया है:
कलेक्टर कार्यालय ने लिया संज्ञान: रायपुर कलेक्टर कार्यालय ने इस आवेदन को गंभीरता से लेते हुए इसे तत्काल संबंधित क्षेत्र के अनुविभागीय अधिकारी (SDM) और अतिरिक्त तहसीलदार को अग्रसारित कर दिया है।
रेलवे को भी भेजी जाएगी सूचना: प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि बहुत जल्द राजस्व विभाग इस संबंध में दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे (SECR) के बिलासपुर या रायपुर रेल मंडल के इंजीनियरिंग विभाग को भी एक पत्र जारी करेगा, ताकि दोनों विभाग मिलकर संयुक्त सीमांकन (नाप-जोख) कर सकें। इस प्रशासनिक और तकनीकी जांच के पूरा होने के बाद ही यह साफ हो पाएगा कि इस महाघपले के पीछे कौन-कौन से बड़े चेहरे शामिल हैं।


