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    राज्यसभा चुनाव का बिगुल बजा, यूपी की 10 और उत्तराखंड की 1 सीट पर मतदान

    लखनऊ। भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में खाली हो रही राज्यसभा सीटों के लिए आधिकारिक चुनाव कार्यक्रम का ऐलान कर दिया है। इनमें उत्तर प्रदेश की 10 और उत्तराखंड की 1 सीट शामिल है। इन सभी सीटों पर आगामी 16 अक्टूबर को मतदान कराया जाएगा। निर्वाचन आयोग के तय शेड्युल के अनुसार, 29 सितंबर से चुनावी प्रक्रिया की शुरुआत होगी। इसके बाद प्रत्याशी 6 अक्टूबर तक अपने नामांकन पत्र दाखिल कर सकेंगे, जबकि 9 अक्टूबर तक नाम वापस लिए जा सकेंगे।

     

    किन सांसदों का कार्यकाल हो रहा है पूरा?

    उत्तर प्रदेश से उच्च सदन के 10 सदस्यों का कार्यकाल 25 नवंबर को पूरा हो रहा है। सेवानिवृत्त होने वाले सांसदों में केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी, भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव अरुण सिंह, पूर्व उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा, पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर, पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) बृजलाल, बीएल वर्मा, गीता उर्फ चंद्रप्रभा, सीमा और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के रामजी गौतम शामिल हैं। वहीं, विपक्षी खेमे से समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और प्रोफेसर रामगोपाल यादव का कार्यकाल भी इसी तिथि को समाप्त हो रहा है। इसके साथ ही उत्तराखंड से भाजपा सांसद नरेश बंसल का कार्यकाल भी पूरा हो रहा है।

    यूपी का सियासी गणित और सीटों का समीकरण

    उत्तर प्रदेश में आगामी राजनीतिक गतिविधियों और विधानसभा चुनावों के मद्देनजर यह राज्यसभा चुनाव बेहद अहम माना जा रहा है। वर्तमान में 403 सदस्यीय उत्तर प्रदेश विधानसभा में कुल 397 विधायक मौजूद हैं। इस मौजूदा संख्या बल के हिसाब से उच्च सदन की एक सीट जीतने के लिए किसी भी उम्मीदवार को लगभग 37 विधायकों के समर्थन की आवश्यकता होगी।

    विधानसभा में करीब 300 विधायकों के मजबूत बहुमत के बल पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के खाते में आसानी से सात से आठ सीटें जाने की संभावना है। पार्टी इनमें से कई मौजूदा चेहरों पर बदलाव भी कर सकती है, क्योंकि पूर्व डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा को पहले ही राज्यपाल नियुक्त किया जा चुका है। दूसरी ओर, बसपा सांसद रामजी गौतम का कार्यकाल समाप्त होने के बाद उच्च सदन में पार्टी का प्रतिनिधित्व शून्य हो जाएगा, क्योंकि वर्तमान विधानसभा में बसपा का एक भी विधायक नहीं है। ऐसे में संख्या बल के अभाव के चलते विपक्षी दलों और क्षेत्रीय समीकरणों में नए बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

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