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    पहाड़ की कंदरा में विराजे राम-सीता, वनवास से जुड़ी आस्था की अनोखी कथा

    बांसवाड़ा। जिले में एक ऐसी पवित्र जगह छुपी है जो न सिर्फ आस्था का केंद्र है बल्कि प्रकृति की अनछुई खूबसूरती का भी बेमिसाल उदाहरण है। जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर एक ऊंची पहाड़ी की गोद में बसा रामकुंड आदिवासी समाज की गहरी श्रद्धा और सदियों पुरानी लोक मान्यताओं को अपने में समेटे हुए है।

    पहाड़ की गुफा में विराजे हैं श्रीराम

    इस पहाड़ी की चोटी पर एक प्राकृतिक गुफा के अंदर भगवान श्रीराम, माता जानकी, लक्ष्मण और हनुमान की प्रतिमाएं स्थापित हैं। यहां पहुंचने के लिए ऊंची-ऊंची सीढ़ियां बनाई गई हैं। गुफा के आसपास और भी कई प्राचीन कंदराएं हैं, जिनमें देवी-देवताओं की मूर्तियां हैं। इनमें से कुछ प्रतिमाएं समय की मार से खंडित हो चुकी हैं, फिर भी इनकी आभा और महत्ता आज भी बरकरार है। यहां भगवान गणेश की प्राचीन प्रतिमा के साथ एक शिवलिंग भी है जिसकी आज भी प्रतिदिन पूजा-अर्चना होती है।

    जब प्यासी थीं सीता मैया और राम ने चलाया बाण

    इस जगह की मान्यता है कि वनवास काल में भगवान श्रीराम यहां से गुजरे थे। इसी दौरान माता सीता को तेज प्यास लगी। चारों तरफ घना जंगल और ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी इलाका था, पानी का कोई स्रोत दूर-दूर तक नहीं था। तब भगवान राम ने अपने धनुष पर बाण चढ़ाकर पहाड़ पर शर संधान किया। उस प्रहार से पहाड़ का एक हिस्सा कट गया और वहां से पानी की एक निर्मल धारा फूट पड़ी। नीचे एक कुंड बन गया जो आज भी रामकुंड के नाम से जाना जाता है। पहाड़ की चट्टानों से आज भी पानी रिसता रहता है और इसी से यह कुंड भरा रहता है। इस कुंड का जल अत्यंत स्वच्छ और निर्मल माना जाता है।

    रामकुंड आगे जाकर भीमकुंड तक मिलता है

    रामकुंड की गुफाओं का एक छोर आगे जाकर भीमकुंड तक पहुंचता है। इस कुंड के बारे में भी मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडव यहां आए थे और भीम ने अपनी गदा से जमीन पर प्रहार कर इस कुंड को बनाया था। यानी यह पूरा क्षेत्र रामायण और महाभारत दोनों कालखंडों की स्मृतियों को अपने में संजोए हुए है।

    बरसात में दिखता है अनोखा नजारा

    मानसून के मौसम में रामकुंड का नजारा देखते ही बनता है। चारों तरफ हरियाली की चादर ओढ़े पहाड़, कलकल बहता पानी और गुफाओं की रहस्यमयी शांति मिलकर एक अलग ही दुनिया का एहसास कराती है। रामकुंड विकास समिति के अथक प्रयासों से यहां सामुदायिक भवन और अन्य सुविधाएं भी विकसित की गई हैं ताकि श्रद्धालु और पर्यटक सुगमता से यहां आ सकें।

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