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    राधा अष्टमी पर पढ़ें श्री राधा कृष्ण स्तोत्र, जीवन में बरसेगी प्रेम की फुहार, मिलेगी सुख, शांति और समृद्धि

    राधा अष्टमी 31 अगस्त दिन रविवार को है. राधा अष्टमी के दिन बरसाने की राधारानी का जन्म हुआ था. पंचांग के अनुसार, द्वापर युग में भाद्रपद मा​ह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को राधा जी जन्म हुआ था. भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति राधा नाम के बिना अधूरी है. राधा और कृष्ण एक दूसरे के पूरक हैं. राधा अष्टमी के अवसर पर आप किशोरी जी का जन्मदिन मनाएं. राधा रानी की भगवान श्रीकृष्ण के साथ विधि ​विधान से पूजा करें. उसके बाद श्री राधा कृष्ण स्तोत्र का पाठ करें. इसके बाद चाहें तो राधा कृष्ण अष्टकम भी पढ़ सकते हैं. श्री राधा कृष्ण स्तोत्र का पाठ करने से जीवन में प्रेम बढ़ता है. इसके साथ ही सुख, शांति और समृद्धि आती है.

    श्री राधा कृष्ण स्तोत्र
    वन्दे नवघनश्यामं पीतकौशेयवाससम्।
    सानन्दं सुन्दरं शुद्धं श्रीकृष्णं प्रकृतेः परम्॥
    राधेशं राधिकाप्राणवल्लभं वल्लवीसुतम्।
    राधासेवितपादाब्जं राधावक्षस्थलस्थितम्॥

    राधानुगं राधिकेष्टं राधापहृतमानसम्।
    राधाधारं भवाधारं सर्वाधारं नमामि तम्॥
    राधाहृत्पद्ममध्ये च वसन्तं सन्ततं शुभम्।
    राधासहचरं शश्वत् राधाज्ञापरिपालकम्॥

    ध्यायन्ते योगिनो योगान् सिद्धाः सिद्धेश्वराश्च यम्।
    तं ध्यायेत् सततं शुद्धं भगवन्तं सनातनम्॥
    निर्लिप्तं च निरीहं च परमात्मानमीश्वरम्।
    नित्यं सत्यं च परमं भगवन्तं सनातनम्॥

    यः सृष्टेरादिभूतं च सर्वबीजं परात्परम्।
    योगिनस्तं प्रपद्यन्ते भगवन्तं सनातनम्॥
    बीजं नानावताराणां सर्वकारणकारणम्।
    वेदवेद्यं वेदबीजं वेदकारणकारणम्॥

    योगिनस्तं प्रपद्यन्ते भगवन्तं सनातनम्।
    गन्धर्वेण कृतं स्तोत्रं यः पठेत् प्रयतः शुचिः।
    इहैव जीवन्मुक्तश्च परं याति परां गतिम्॥
    हरिभक्तिं हरेर्दास्यं गोलोकं च निरामयम्।
    पार्षदप्रवरत्वं च लभते नात्र संशयः॥

    राधा कृष्ण अष्टकम
    चथुर मुखाधि संस्थुथं, समास्थ स्थ्वथोनुथं।
    हलौधधि सयुथं, नमामि रधिकधिपं ॥
    भकाधि दैथ्य कालकं, सगोपगोपिपलकं।
    मनोहरसि थालकं, नमामि रधिकधिपं॥

    सुरेन्द्र गर्व बन्जनं, विरिञ्चि मोह बन्जनं।
    वृजङ्ग ननु रञ्जनं, नमामि रधिकधिपं॥
    मयूर पिञ्च मण्डनं, गजेन्द्र दण्ड गन्दनं।
    नृशंस कंस दण्डनं, नमामि रधिकधिपं॥

    प्रदथ विप्रदरकं, सुधमधम कारकं।
    सुरद्रुमपःअरकं, नमामि रधिकधिपं॥
    दानन्जय जयपाहं, महा चमूक्षयवाहं।
    इथमहव्यधपहम्, नमामि रधिकधिपं॥

    मुनीन्द्र सप करणं, यदुप्रजप हरिणं।
    धरभरवत्हरणं, नमामि रधिकधिपं॥
    सुवृक्ष मूल सयिनं, मृगारि मोक्षधयिनं।
    श्र्वकीयधमययिनम्, नमामि रधिकधिपं॥

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